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इन्द्र॒ य उ॒ नु ते॒ अस्ति॒ वाजो॒ विप्रे॑भि॒: सनि॑त्वः । अ॒स्माभि॒: सु तं स॑नुहि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indra ya u nu te asti vājo viprebhiḥ sanitvaḥ | asmābhiḥ su taṁ sanuhi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्र॑ । यः । ऊँ॒ इति॑ । नु । ते॒ । अस्ति॑ । वाजः॑ । विप्रे॑भिः । सनि॑त्वः । अ॒स्माभिः॑ । सु । तम् । स॒नु॒हि॒ ॥ ८.८१.८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:81» मन्त्र:8 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:38» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:8


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - मनुष्यगण उस परमात्मा की (प्र+स्तोषत्) अच्छे प्रकार स्तुति करें (गासिषत्) गान करें (गीयमानम्+साम) गीयमान स्तुति को (श्रवत्) सुनें और (राधसा) अभ्युदय से युक्त होकर (अभि+जुगुरत्) सर्वत्र ईश्वरीय आज्ञा का प्रचार करें ॥५॥
भावार्थभाषाः - सब प्रकार उसमें मन लगावें, यह इसका आशय है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु के वल से बल सम्पन्न बनें

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यः) = जो (उ) = निश्चय से (नु) = अब (ते) = आपका (वाज:) = बल (अस्ति) = है, वह (वि त्रेभिः) = ज्ञान के द्वारा अपना पूरण करनेवाले पुरुषों से (सनित्व:) = सम्भजनीय होता है। [२] आप (तम्) = उस बल को (अस्माभिः सु सनुहि) = हमारे साथ सम्यक् सम्भक्त करिये। उस बल को आप हमारे लिये दीजिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ज्ञानी पुरुष प्रभु के बल को प्राप्त करने के लिये यत्नशील होते हैं। हम भी उस बल से अपने को सम्भक्त करनेवाले बनें।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - मनुष्यस्तमीषम्। प्र+स्तोषत्=प्रकर्षेण स्तौतु। उप+गासिषत्=उपगायति। गीयमानं साम। श्रवत्=शृणोतु। तथा राधसा=अभ्युदयेन=अभि। जुगुरत्=अभिगृणातु ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of glory, the wealth and knowledge, honour and excellence that is yours and good for the vibrant sage, pray bring in for us and let it grow among us.