यस्य॑ व्र॒ते पृ॑थि॒वी नन्न॑मीति॒ यस्य॑ व्र॒ते श॒फव॒ज्जर्भु॑रीति। यस्य॑ व्र॒त ओष॑धीर्वि॒श्वरू॑पाः॒ स नः॑ पर्जन्य॒ महि॒ शर्म॑ यच्छ ॥५॥
yasya vrate pṛthivī nannamīti yasya vrate śaphavaj jarbhurīti | yasya vrata oṣadhīr viśvarūpāḥ sa naḥ parjanya mahi śarma yaccha ||
यस्य॑। व्र॒ते। पृ॒थि॒वी। नन्न॑मीति। यस्य॑। व्र॒ते। श॒फऽव॑त्। जर्भु॑रीति। यस्य॑। व्र॒ते। ओष॑धीः। वि॒श्वऽरू॑पाः। सः। नः॒। प॒र्ज॒न्य॒। महि॑। शर्म॑। य॒च्छ॒ ॥५॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर वह मेघ कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु के अटल नियम
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः स मेघः कीदृश इत्याह ॥
हे पर्जन्य तद्वद्वर्त्तमान विद्वन् ! यस्य मेघस्य व्रते पृथिवी नन्नमीति यस्य व्रते शफवज्जर्भुरीति यस्य व्रते विश्वरूपा ओषधीर्जायन्ते तद्विद्यया युक्तः स त्वं नो महि शर्म्म यच्छ ॥५॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
How cloud is beneficial is told.
O learned person ! benevolent like the cloud, you know the science of the cloud. Its function on the earth is bowed down, through whose function, hoofed cattle thrive, through whose function plants are assured all kinds of development. Grant us great happiness and abode.
