वरण में मन व मस्तिष्क का स्थान
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्याः) = इस सूर्या का, (यद्) = जब कि यह (सूर्या) = सावित्री (गृहम्) = अपने घर को, उस घर को जिसका कि उसने निर्माण करना है (अयात्) = गई, उस समय (मनः) = मन ही (अनः) = रथ (आसीत्) = था । अपने मनोरथ पर आरूढ़ होकर यह पतिगृह को गई । अर्थात् पतिगृह को इच्छापूर्वक प्रसन्नता से गई । माता-पिता ने इससे बिना स्वीकृति लिये इसका सम्बन्ध नहीं कर दिया । [२] उस समय मन तो रथ था, (उत) = और (द्यौ:) = मस्तिष्क [मूर्ध्नो द्यौः ] (छदिः आसीत्) = छत थी । उस रथ का रक्षक मस्तिष्क था । केवल हृदय की भावुकता के कारण यह सम्बन्ध न हो गया था, यह सम्बन्ध मस्तिष्क से, अर्थात् सब बातें सोच-विचार कर ही किया गया था । हृदय के ऊपर मस्तिष्क की स्थिति इस बात को सुव्यक्त कर रही है कि हमें भावना से बुद्धि को अधिक महत्त्व देना है। [३] इस मनोमय रथ की छत मस्तिष्क बना तो (शुक्रौ) = गतिशील व दीप्त [शुक् गतौ, शुच् दीप्तौ ] कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ इस रथ के (अनड्वाहौ) = वृषभ (आस्ताम्) = थे । इसकी कर्मेन्द्रियाँ कर्म-निपुण होती हुई इसे सशक्त बना रही थी और ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति में कुशल होती हुई, इसे ज्ञानदीत कर रही थी ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पति के चुनाव में सूर्या भी सहमत थी । यह सम्बन्ध, भावुकता के कारण न होकर, सोच समझकर किया गया था। सूर्या की इन्द्रियों की शक्ति का समुचित विकास हो चुका था ।