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भो॒जायाश्वं॒ सं मृ॑जन्त्या॒शुं भो॒जाया॑स्ते क॒न्या॒३॒॑ शुम्भ॑माना । भो॒जस्ये॒दं पु॑ष्क॒रिणी॑व॒ वेश्म॒ परि॑ष्कृतं देवमा॒नेव॑ चि॒त्रम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

bhojāyāśvaṁ sam mṛjanty āśum bhojāyāste kanyā śumbhamānā | bhojasyedam puṣkariṇīva veśma pariṣkṛtaṁ devamāneva citram ||

पद पाठ

भो॒जाय॑ । अश्व॑म् । सम् । मृ॒ज॒न्ति॒ । आ॒शुम् । भो॒जाय॑ । आ॒स्ते॒ । क॒न्या॑ । शुम्भ॑माना । भो॒जस्य॑ । इ॒दम् । पु॒ष्क॒रिणी॑ऽइव । वेश्म॑ । परि॑ऽकृतम् । दे॒व॒मा॒नाऽइ॑व । चि॒त्रम् ॥ १०.१०७.१०

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:107» मन्त्र:10 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:4» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:10


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (भोजाय) अन्यों का पालन करनेवाले के लिये (आशुम्) शीघ्रगामी (अश्वम्) घोड़े को (सं मृजन्ति) अलङ्कृत करते हैं-सजाते हैं सेवक (भोजाय) पालन करनेवाले के लिये (शुम्भमाना) शोभायमान (कन्या) नवयौवनसम्पन्न कमनीय कुमारी (आस्ते) स्थित है-विवाहार्थ तैयार है (भोजाय) पालन करनेवाले के लिये (इदं-वेश्म) यह घर (परिष्कृतम्) संस्कृत (पुष्करिणी-इव) कमलवाली जलस्थली के समान (चित्रं) दर्शनीय (देवमाना-इव) देवों ऊँचे विद्वान् शिल्पियों से निर्माण किया हुआ जैसा सदन है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - अन्यों का पालन करने के लिये सवारी करने को सुसज्जित घोड़ा, सुन्दर यौवनसम्पन्न कुमारी विवाह करने को, कमल जलस्थली के समान गृह दर्शनीय होता है रहने को ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दान से यश व ऐश्वर्य

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (भोजाय) - दान द्वारा औरों का पालन करनेवाले के लिए (आशुं अश्वम्) = शीघ्रगामी घोड़े को (संमृजन्ति) = परिचारक लोग सम्यक् अलंकृत करते हैं। अर्थात् इनके आने-जाने के लिए सवारी सदा तैयार रहती है। (भोगाय) = इस औरों का पालन करनेवाले पुरुष के लिए (शुम्भमाना) = शरीरावयवों से शोभमान तथा उत्तम वस्त्रादि से अलंकृत (कन्या) = युवति (आस्ते) = सेवा के लिए उपस्थित रहती है । अर्थात् इसके घर में परिचारिकाओं की कभी नहीं रहती । [२] (भोजस्य) = इस पालन करनेवाले का (इदम्) = यह (वेश्म) = घर (पुष्करिणी इव) = कमलों से अलंकृत सरसी के समान (परिष्कृतम्) = सुसज्जित होता है। यह इसका घर (देवमाना इव) = देवताओं से मापकर बनाए गये घर के समान (चित्रम्) = अद्भुत होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- दानशील पुरुष को उत्तम सवारियाँ सेविकाएँ व सुसंस्कृत [ अलंकृत] गृह प्राप्त होते हैं ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (भोजाय-आशुम्-अश्वं सं मृजन्ति) अन्यान् भोजयित्रे पालयित्रे राज्ञे शीघ्रगामिनमश्वं समलङ्कुर्वन्ति सेवकाः, “मृजु अलङ्कारे” [चुरादि०] (भोजाय शुम्भमाना कन्या-आस्ते) पालयित्रे, शोभायमाना नवयौवनसम्पन्ना कमनीया कुमारी स्थिता भवति (भोजस्य-इदं वेश्म परिष्कृतं पुष्करिणी-इव) पालयितुरिदं गृहं संस्कृतं कमलवतीजलभूमिसमानं सम्पादयन्ति परिचराः (चित्रं देवमाना-इव) चायनीयं दर्शनीयं देवमानं “आकारादेशश्छान्दसः” देवैर्मानं निर्माणं कृतं यस्य तादृशमस्ति ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the generous giver they embellish and adorn the fleet horse, for the generous groom the maiden waits and sits on the wedding vedi in all her finery, and for the generous man is this home, lovely as a rose bouquet and decorated, wonder worked and sanctified as a temple of divinities.