'इन्द्र-नर-देव' का सोमपान
Word-Meaning: - हे (सोम) = वीर्य ! तू (वृत्रघ्ने) = ज्ञान की आवरणभूत वासना को विनष्ट करनेवाले (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (पातवे) = शरीर के अन्दर ही व्याप्त होने के लिये (परिषिच्यसे) = शरीर में चारों ओर सिक्त होता है । अर्थात् सोम का पान [शरीर में रक्षण] वासना को जीतनेवाला जितेन्द्रिय पुरुष ही कर पाता है । (दक्षिणावते) = दान की वृत्ति वाले (नरे) = [नृ ङे] पुरुष के लिये यह सोम शरीर में परिषिक्त होता है। और (सदनासदे) = यज्ञगृह में आसीन होनेवाले (देवाय) = देववृत्ति के पुरुष के लिये तू परिषिक्त होता है । अर्थात् सोम का रक्षण दानशील त्यागी पुरुष कर पाता है और यज्ञ आदि उत्तम कर्मों में आसीन होनेवाला देव पुरुष कर पाता है ।
Connotation: - भावार्थ- सोम का पान तीन व्यक्ति करते हैं, वासना का विजेता जितेन्द्रिय पुरुष, दानशील त्यागी पुरुष तथा यज्ञगृह में आसीन होनेवाला देव पुरुष ।