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इन्द्रा॑य सोम॒ पात॑वे वृत्र॒घ्ने परि॑ षिच्यसे । नरे॑ च॒ दक्षि॑णावते दे॒वाय॑ सदना॒सदे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrāya soma pātave vṛtraghne pari ṣicyase | nare ca dakṣiṇāvate devāya sadanāsade ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रा॑य । सो॒म॒ । पात॑वे । वृ॒त्र॒ऽघ्ने । परि॑ । सि॒च्य॒से॒ । नरे॑ । च॒ । दक्षि॑णाऽवते । दे॒वाय॑ । स॒द॒न॒ऽसदे॑ ॥ ९.९८.१०

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:98» मन्त्र:10 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:24» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:10


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (वृत्रघ्ने) अज्ञान के नाशक (इन्द्राय) कर्मयोगी की (पातवे) तृप्ति के लिये (परिषिच्यसे) साक्षात्कार किये जाते हो (दक्षिणावते, नरे) अनुष्ठानी विद्वान् (देवाय) जो दिव्यगुणयुक्त हैं, उसके लिये (सदनासदे) यज्ञगृह में साक्षात्कार किये जाते हो ॥१०॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा कर्मयोगी तथा अनुष्ठानी विद्वानों का ही साक्षात्करणार्ह है ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'इन्द्र-नर-देव' का सोमपान

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सोम) = वीर्य ! तू (वृत्रघ्ने) = ज्ञान की आवरणभूत वासना को विनष्ट करनेवाले (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (पातवे) = शरीर के अन्दर ही व्याप्त होने के लिये (परिषिच्यसे) = शरीर में चारों ओर सिक्त होता है । अर्थात् सोम का पान [शरीर में रक्षण] वासना को जीतनेवाला जितेन्द्रिय पुरुष ही कर पाता है । (दक्षिणावते) = दान की वृत्ति वाले (नरे) = [नृ ङे] पुरुष के लिये यह सोम शरीर में परिषिक्त होता है। और (सदनासदे) = यज्ञगृह में आसीन होनेवाले (देवाय) = देववृत्ति के पुरुष के लिये तू परिषिक्त होता है । अर्थात् सोम का रक्षण दानशील त्यागी पुरुष कर पाता है और यज्ञ आदि उत्तम कर्मों में आसीन होनेवाला देव पुरुष कर पाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम का पान तीन व्यक्ति करते हैं, वासना का विजेता जितेन्द्रिय पुरुष, दानशील त्यागी पुरुष तथा यज्ञगृह में आसीन होनेवाला देव पुरुष ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वोत्पादक ! (वृत्रघ्ने) अज्ञाननाशको भवान् (इन्द्राय) कर्मयोगिनः (पातवे) तृप्तये (परिषिच्यसे) साक्षात्क्रियते (देवाय) दिव्यगुणाय (दक्षिणावते, नरे) अनुष्ठानिने विदुषे (सदनासदे) यज्ञगृहेषु साक्षात्क्रियते ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma spirit of light and ecstasy of grace, you are adored and served for the soul’s experience of divinity, for the man of charity and the brilliant sage on the vedi of yajnic service so that the demon of evil, darkness and ignorance may be expelled from the soul of humanity and destroyed.