Word-Meaning: - (महिषाः) = परमात्मा का पूजन करनेवाले (अदब्धाः) = वासनाओं से अहिंसित लोग (इन्दुं रिहन्ति) = सोम का आस्वादन करते हैं, सोमरक्षण के आनन्द का अनुभव करते हैं। इस सोमरक्षण के लिये (कवयः) = ज्ञानी पुरुष (पदे रेभन्ति) = उन मुनियों से गन्तव्य प्रभु के विषय में [पद्यते मुनिभिर्यस्मात् तस्मात् पद उदाहृतः] स्तुति शब्दों का उच्चारण करते हैं। (न गृध्राः) = लालची नहीं होते । प्रभुस्तवन की वृत्ति से दूर रहकर लालच में पड़ जाने पर सोमरक्षण का सम्भव नहीं होता । (धीराः) = ज्ञान में रमण करनेवाले धीर पुरुष (दशभिः क्षिपाभिः) = दसों इन्द्रियों को विषयों से पृथक् रखने के द्वारा, दस क्षिपाओं [ परे फेंकना] के द्वारा (हिन्वन्ति) = सोम को शरीर में ही प्रेरित करते हैं। इस (अपां रसेन) = जलों के रस रूप सोम से [आपः रेतो भूत्वा० ] (रूपम्) = अपने रूप को समञ्जते सम्यक् अलंकृत करते हैं। यह सोम ही तो उन्हें तेजस्वी व ज्ञानदीप्त बनाकर उत्तम रूप प्राप्त कराता है ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभुस्तवन द्वारा वासनाओं से हिंसित न होना ही सोमरक्षण का मार्ग है। ज्ञान में प्रवृत्त रहना, लालच से दूर रहना भी सोमरक्षण के लिये आवश्यक है। सुरक्षित सोम हमें तेजोमय ज्ञानदीप्त रूप प्राप्त कराता है।