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इन्दुं॑ रिहन्ति महि॒षा अद॑ब्धाः प॒दे रे॑भन्ति क॒वयो॒ न गृध्रा॑: । हि॒न्वन्ति॒ धीरा॑ द॒शभि॒: क्षिपा॑भि॒: सम॑ञ्जते रू॒पम॒पां रसे॑न ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

induṁ rihanti mahiṣā adabdhāḥ pade rebhanti kavayo na gṛdhrāḥ | hinvanti dhīrā daśabhiḥ kṣipābhiḥ sam añjate rūpam apāṁ rasena ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्दु॑म् । रि॒ह॒न्ति॒ । म॒हि॒षाः । अद॑ब्धाः । प॒दे । रे॒भ॒न्ति॒ । क॒वयः॑ । न । गृध्राः॑ । हि॒न्वन्ति॑ । धीराः॑ । द॒शऽभिः॑ । क्षिपा॑भिः । सम् । अ॒ञ्ज॒ते॒ । रू॒पम् । अ॒पाम् । रसे॑न ॥ ९.९७.५७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:57 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:22» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:57


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दुम्) प्रकाशस्वरूप परमात्मा को (अदब्धाः) दृढ़ प्रतिज्ञावाले (महिषाः) जो सद्गुणों के प्रभाव से महापुरुष हैं, वे (रिहन्ति) प्राप्त होते हैं, (न, गृध्राः) निष्काम कर्मी (कवयः) विद्वान् (पदे) ज्ञानरूपी यज्ञ की वेदी में (रेभन्ति) जैसे शब्दायमान होते हैं, (धीराः) धीर लोग (दशभिः) दश (क्षिपाभिः) प्राणों की गति से (अपाम्) सत्कर्मों के (रसेन) परिपाक से (रूपम्) उक्त परमात्मा के स्वरूप को (समञ्जते) साक्षात्कार करते हैं ॥५७॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में प्राणायाम के द्वारा परमात्मा की प्राप्ति का वर्णन किया है ॥५७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कवयो, न घृध्राः

पदार्थान्वयभाषाः - (महिषाः) = परमात्मा का पूजन करनेवाले (अदब्धाः) = वासनाओं से अहिंसित लोग (इन्दुं रिहन्ति) = सोम का आस्वादन करते हैं, सोमरक्षण के आनन्द का अनुभव करते हैं। इस सोमरक्षण के लिये (कवयः) = ज्ञानी पुरुष (पदे रेभन्ति) = उन मुनियों से गन्तव्य प्रभु के विषय में [पद्यते मुनिभिर्यस्मात् तस्मात् पद उदाहृतः] स्तुति शब्दों का उच्चारण करते हैं। (न गृध्राः) = लालची नहीं होते । प्रभुस्तवन की वृत्ति से दूर रहकर लालच में पड़ जाने पर सोमरक्षण का सम्भव नहीं होता । (धीराः) = ज्ञान में रमण करनेवाले धीर पुरुष (दशभिः क्षिपाभिः) = दसों इन्द्रियों को विषयों से पृथक् रखने के द्वारा, दस क्षिपाओं [ परे फेंकना] के द्वारा (हिन्वन्ति) = सोम को शरीर में ही प्रेरित करते हैं। इस (अपां रसेन) = जलों के रस रूप सोम से [आपः रेतो भूत्वा० ] (रूपम्) = अपने रूप को समञ्जते सम्यक् अलंकृत करते हैं। यह सोम ही तो उन्हें तेजस्वी व ज्ञानदीप्त बनाकर उत्तम रूप प्राप्त कराता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभुस्तवन द्वारा वासनाओं से हिंसित न होना ही सोमरक्षण का मार्ग है। ज्ञान में प्रवृत्त रहना, लालच से दूर रहना भी सोमरक्षण के लिये आवश्यक है। सुरक्षित सोम हमें तेजोमय ज्ञानदीप्त रूप प्राप्त कराता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दुं) उक्तपरमात्मानं (अदब्धाः) दृढप्रतिज्ञाः (महिषाः) सद्गुणप्रभावेण महापुरुषाः (रिहन्ति) लभन्ते (न, गृध्राः) निष्कामकर्मिणः (कवयः) विद्वांसः (पदे) ज्ञानयज्ञवेद्यां (रेभन्ति) यथा शब्दायन्ते (धीराः) धीरजनाः (दशभिः, क्षिपाभिः) दशभिः प्राणगतिभिः (अपां, रसेन) सत्कर्मणा परिपाकेन (रूपं) परमात्मस्वरूपं (समञ्जते) साक्षात्कुर्वन्ति ॥५७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Great undaunted celebrants love and adore Soma on the yajna vedi. Passionate strivers as well as poets sing and celebrate it in song. Constant devotees with all ten senses and pranic energies worship it in peace and quiet, and by the fluent pleasure and power of it they join the very presence of it.