Word-Meaning: - हे (सोम) = वीर्यशक्ते! (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम तू (नः) = हमारे लिये (पवमानः) = पवित्रता को करता हुआ (इषम्) = प्रभु प्रेरणा को आपवस्व प्राप्त करा, जो प्रेरणा (संयतम्) = हमें उत्तम मार्ग से ले चलनेवाली है। (पिप्युषीम्) = हमारा आप्यापन करनेवाली है तथा (अस्त्रिधम्) = हमें हिंसित नहीं होने देती । सोमरक्षण से पवित्र हृदयवाले होकर हम प्रभु प्रेरणा को सुनें यह प्रेरणा हमें सन्मार्ग पर ले चलनेवाली, हमारा वर्धन करनेवाली व हमें हिंसित होने से बचानेवाली होगी। या जो प्रेरणा (असश्चषी) = हमें आसक्त न होने देती हुई (नः) = हमारे लिये (अहन्) = इस जीवनरूपी दिन में (त्रिः) = तीन बार-प्रातः सवन माध्यन्दिन सवन व तृतीय सवन में (सुवीर्यम्) = उत्तम शक्ति का (दोहते) = प्रपूरण करती है। उस उत्तम शक्ति का, जो (क्षुमत्) = ज्ञान के शब्दोंवाली है [क्षुशब्दे] (वाजवत्) = शरीर के बलवाली है तथा (मधुमत्) = मन के माधुर्यवाली है।
Connotation: - भावार्थ- सोम हमें पवित्र बनाकर प्रभु प्रेरणा को सुनाता है, जो प्रेरणा हमें सन्मार्ग पर ले चलती है, हमारा वर्धन करती है और हिंसन नहीं होने देती। यह प्रेरणा ही हमारे जीवन के प्रारम्भ, मध्य व अन्त में, अर्थात् सदा उस उत्तम शक्ति को भरती है जो 'ज्ञान, बल व माधुर्य' वाली है ।