चारों आश्रमों की पवित्रता
Word-Meaning: - [१] जीवन के प्रथमाश्रम में (देवजना:) = माता, पिता व आचार्य रूप देवजन [मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव] (मा:) = मुझे (पुनन्तु) = पवित्र करें। माता मेरे चरित्र का निर्माण करे, पिता शिष्टाचार को मुझे सिखाये तथा आचार्य मुझे ज्ञान का भोजन ग्रहण करायें। [२] अब गृहस्थ में (वसवः) = गार्हस्थ्य जीवन में निवास को उत्तम बनानेवाले [वासयन्ति इति वसवः ] समय-समय पर उपस्थित होनेवाले अतिथिजन (धिया) = ज्ञानपूर्वक कर्मों के द्वारा पुनन्तु हमें पवित्र करें। 'अतिथि देवो भव' ये विद्वान् अतिथि हमारे लिये देवतुल्य हों, और इनकी समय-समय पर प्राप्त होनेवाली प्रेरणा के अनुसार कर्म करते हुए हम पवित्र जीवनोंवाले बनें। [३] जीवन के तृतीय आश्रम में (विश्वे देवाः) = हे देववृत्ति के पुरुषो! (मा) = मुझे (पुनीत) = पवित्र करो। वानप्रस्थ में मेरा सान्निध्य सब देववृत्ति के पुरुषों से हो। उनके साथ निरन्तर होनेवाली ज्ञानचर्चा मेरे जीवन को पवित्र बनाये । [३] अन्ततः संन्यास में, एकाकी विचरण के नियमवाले इस तुरीयाश्रम में, हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो ! (मा पुनीहि) = आप मुझे पवित्र करिये मैं सदा आपका स्मरण करूँ और पवित्र जीवनवाला बना रहूँ।
Connotation: - भावार्थ - प्रथमाश्रम में देवजन, द्वितीयाश्रम में वसु, तृतीय में विश्वेदेव व तुरीय में सर्वज्ञ प्रभु मेरे जीवन को पवित्र बनायें।