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पु॒नन्तु॒ मां दे॑वज॒नाः पु॒नन्तु॒ वस॑वो धि॒या । विश्वे॑ देवाः पुनी॒त मा॒ जात॑वेदः पुनी॒हि मा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

punantu māṁ devajanāḥ punantu vasavo dhiyā | viśve devāḥ punīta mā jātavedaḥ punīhi mā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पु॒नन्तु॑ । माम् । दे॒व॒ऽज॒नाः । पु॒नन्तु॑ । वस॑वः । धि॒या । विश्वे॑ । दे॒वाः॒ । पु॒नी॒त । मा॒ । जात॑ऽवेदः । पु॒नी॒हि । मा॒ ॥ ९.६७.२७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:67» मन्त्र:27 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:27


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवजनाः) विद्वान् जन (मा) मुझको उपदेश द्वारा (पुनन्तु) पवित्र करें। (वसवः) नैष्ठिक ब्रह्मचारी गण (धिया) अपनी शुद्ध बुद्धि द्वारा (पुनन्तु) पवित्र करें (विश्वेदेवाः) हे विद्वानों ! (मां) मुझको आप लोग (पुनीत) पवित्र करें। तथा (जातवेदः) हे परमात्मन् ! (मा) मुझको (पुनीहि) पवित्र करिए ॥२७॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा ने विद्वानों के उपदेश द्वारा पवित्रता का उपदेश दिया है कि हे जीवो ! तुम अपने विद्वानों से तथा ब्रह्मचारी गणों से सदैव सद्बुद्धि का ग्रहण किया करो ॥२७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

चारों आश्रमों की पवित्रता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] जीवन के प्रथमाश्रम में (देवजना:) = माता, पिता व आचार्य रूप देवजन [मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव] (मा:) = मुझे (पुनन्तु) = पवित्र करें। माता मेरे चरित्र का निर्माण करे, पिता शिष्टाचार को मुझे सिखाये तथा आचार्य मुझे ज्ञान का भोजन ग्रहण करायें। [२] अब गृहस्थ में (वसवः) = गार्हस्थ्य जीवन में निवास को उत्तम बनानेवाले [वासयन्ति इति वसवः ] समय-समय पर उपस्थित होनेवाले अतिथिजन (धिया) = ज्ञानपूर्वक कर्मों के द्वारा पुनन्तु हमें पवित्र करें। 'अतिथि देवो भव' ये विद्वान् अतिथि हमारे लिये देवतुल्य हों, और इनकी समय-समय पर प्राप्त होनेवाली प्रेरणा के अनुसार कर्म करते हुए हम पवित्र जीवनोंवाले बनें। [३] जीवन के तृतीय आश्रम में (विश्वे देवाः) = हे देववृत्ति के पुरुषो! (मा) = मुझे (पुनीत) = पवित्र करो। वानप्रस्थ में मेरा सान्निध्य सब देववृत्ति के पुरुषों से हो। उनके साथ निरन्तर होनेवाली ज्ञानचर्चा मेरे जीवन को पवित्र बनाये । [३] अन्ततः संन्यास में, एकाकी विचरण के नियमवाले इस तुरीयाश्रम में, हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो ! (मा पुनीहि) = आप मुझे पवित्र करिये मैं सदा आपका स्मरण करूँ और पवित्र जीवनवाला बना रहूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रथमाश्रम में देवजन, द्वितीयाश्रम में वसु, तृतीय में विश्वेदेव व तुरीय में सर्वज्ञ प्रभु मेरे जीवन को पवित्र बनायें।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवजनाः) विद्वज्जनाः (माम्) मामुपदेशेन (पुनन्तु) पवित्रयन्तु (वसवः) नैष्ठिका ब्रह्मचारिणः (धिया) स्वीयशुद्धबुद्ध्या (पुनन्तु) पवित्रयन्तु (विश्वे देवाः) हे विद्वांसः ! (माम्) मां (पुनीत) यूयं पवित्रयत। तथा (जातवेदः) हे जगदीश्वर ! (मा) मां (पुनीहि) पवित्रय ॥२७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the brilliant generous sages and scholars purify me. May the Vasus, givers of peace and settlement, sanctify me with knowledge and wisdom. May all divinities of nature and humanity vitalise me. O Jataveda, omniscient Agni, pray purify and sanctify me.