पुरुश्चन्द्रं पुरुस्पृहं [ रयिम् ]
Word-Meaning: - [१] हे सोम ! तू (रयिम्) = ऐश्वर्य को (आपवस्व) = हमारे लिये सर्वथा प्राप्त करा । उस रयि को, जो कि (सहस्रिणम्) = [सहस्] आनन्द का कारणभूत है। (गोमन्तम्) = प्रशस्त ज्ञानेन्द्रियोंवाला है। तथा (अश्विनम्) = प्रशस्त कर्मेन्द्रियोंवाला है । सोमरक्षण से ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ उत्तम बनती हैं, जीवन आनन्दमय होता है । [२] उस रयि को, हे सोम ! तू प्राप्त करा, जो कि (पुरुश्चन्द्रम्) = पालक व पूरक होता हुआ आह्लाद को देनेवाला है तथा (पुरुस्पृहम्) = पालक व पूरक होने के कारण स्पृहणीय है । सोम से प्राप्त कराया गया यह रयि ही 'तेज, वीर्य, बल व ओज, ज्ञान व आनन्द' के रूप में प्रकट होता है और जीवन को स्पृहणीय बना देता है।
Connotation: - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम शरीर के लिये अद्भुत रयि को देनेवाला होता है। इस रयि के परिणामस्वरूप जीवन उत्तम ज्ञानेन्द्रियोंवाला, उत्तम कर्मेन्द्रियोंवाला व आनन्दमय बनता है ।