ए॒ष उ॒ स्य पु॑रुव्र॒तो ज॑ज्ञा॒नो ज॒नय॒न्निष॑: । धार॑या पवते सु॒तः ॥
English Transliteration
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eṣa u sya puruvrato jajñāno janayann iṣaḥ | dhārayā pavate sutaḥ ||
Pad Path
ए॒षः । ऊँ॒ इति॑ । स्यः । पु॒रु॒ऽव्र॒तः । ज॒ज्ञा॒नः । ज॒नय॑न् । इषः॑ । धार॑या । प॒व॒ते॒ । सु॒तः ॥ ९.३.१०
Rigveda » Mandal:9» Sukta:3» Mantra:10
| Ashtak:6» Adhyay:7» Varga:21» Mantra:5
| Mandal:9» Anuvak:1» Mantra:10
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - (स्यः) वह पूर्वोक्त परमात्मा (पुरुव्रतः) अनन्तकर्मा है (जज्ञानः) सर्वत्र प्रसिद्ध (इषः) सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को (जनयन्) उत्पन्न करता हुआ (सुतः) स्वसत्ता से विराजमान (एषः) यह (धारया) अपनी सुधामयी वृष्टि की धाराओं से (पवते) सबको पवित्र करता है ॥१०॥
Connotation: - जो परमात्मा अनन्तकर्म्मा है, वही अपनी शक्ति से सब लोक-लोकान्तरों को उत्पन्न करता है और वही अपनी पवित्रता से सबको पवित्र करता है। अनन्तकर्म्मा, यहाँ परमात्मा को उसकी अनन्त शक्तियों के अभिप्राय से वर्णन किया है, किसी शारीरिक कर्म के अभिप्राय से नहीं ॥१०॥२१॥ तीसरा सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
प्रभु-प्रेरणा को सुनना
Word-Meaning: - [१] (एषः) = यह (स्यः) = वह सोम (उ) = निश्चय से (पुरुव्रतः) = पालन व पूरक कर्मोंवाला है। यह हमारे शरीरों का रोगों से रक्षण करता है और हमारे मनों में हीन भावनाओं को नहीं उत्पन्न होने देता । (जज्ञान:) = हमारे शरीरों में प्रादुर्भूत होता हुआ यह सोम (इषः) = हृदयस्थ प्रभु की उत्तम प्रेरणाओं को (जनयन्) = प्रकट करता है। इसके रक्षण से ही हमें नैर्मल्य के द्वारा अन्तः प्रेरणायें सुन पड़ती हैं। [२] (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ यह सोम (धारया) = अपनी धारणशक्ति से हमारे जीवनों को पवते पवित्र करता है।
Connotation: - भावार्थ-सोम हमें प्रभु प्रेरणाओं को सुनने के लिये आवश्यक पवित्रता को प्राप्त कराता है। इस प्रकार सोम के महत्त्व को समझकर इस हिरण्य [सोम-वीर्य] के स्तूप [समुच्छ्राय - ऊर्ध्वगति] को करनेवाला 'हिरण्यस्तूप' अगले सूक्त का ऋषि है। वह सोम का स्तवन करता हुआ उत्कृष्ट जीवन की प्राप्ति के लिये आराधना करता है-
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - (एष स्यः) सोऽयं परमात्मा (पुरुव्रतः) अनन्तकर्मा (जज्ञानः) सर्वत्र प्रसिद्धः (इषः) सर्वं लोकलोकान्तरम् (जनयन्) उत्पादयन् (सुतः) स्वसत्तया विराजमानः (धारया) स्वपीयूषवर्षेण (पवते) सर्वं पवित्रयति ॥१०॥ तृतीयं सूक्तं एकविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
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DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - This spirit of divinity, power of infinite law and action, creating and providing food, energy and sustenance for life, flows on in continuum, self- sustained, self-revealed, discovered, self-realised.
