Word-Meaning: - [१] (तम्) = उस (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यशाली प्रभु को (गीर्भिः) = स्तुतिवाणियों के द्वारा (स्वसरेषु अभिर्नवामहे) = दिनों में [सूर्यकर्तृकेषु दिवसेषु नि० ] प्रातः-सायं [अभि] स्तुत करते हैं- प्रभु की ओर जाते हैं, प्रभु की उपासना में बैठते हैं। इस प्रकार प्रभु की ओर जाते हैं (न) = जैसे स्वसरेषु [सुष्ठु अस्यन्ते प्रेर्यन्ते गावः अत्र ] गोष्ठों में (धेनवः) = गौवें (वत्सम्) = बछड़े की ओर जाती हैं। जिस प्रकार प्रेम से भरी हुई गौवें जाती हैं, उसी प्रकार प्रेम से परिपूर्ण हृदयोंवाले हम प्रभु की ओर जानेवाले बनें। [२] उस प्रभु की ओर हम जायें, जो (वः दस्यम्) = तुम सबके दुःखों का उपक्षय करनेवाले हैं। (ऋतीबहम्) = [ऋतयो बाधकाः शत्रवः] काम-क्रोध आदि बाधक शत्रुओं का पराभव करनेवाले (वसोः) = हमारे निवासों को उत्तम बनानेवाले (अन्धसः) = सोम [वीर्य] के द्वारा (मन्दानम्) = हमें हैं। आनन्दित करनेवाले हैं। वस्तुतः प्रभु काम-क्रोध आदि को विनष्ट करके हमें सोमरक्षण द्वारा सब दुःखों से दूर व आनन्द से परिपूर्ण जीवनवाला बनाते हैं।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रातः - सायं प्रभु की उपासना करें। प्रभु हमारी वासनाओं को विनष्ट करके हमारे अन्दर सोम का रक्षण करते हैं और हमारे दुःखों को दूर करके हमें आनन्दमय जीवनवाला बनाते हैं।