'क्षियन्तः-यान्तः' [देवान् हूमहे]
Word-Meaning: - [१] हे (सुदानवः) = [दाप् लवने] बुराइयों का अच्छी प्रकार छेदन करनेवाले देवो ! (वयम्) = हम (इत्) = निश्चय से (क्षियन्तः) = घरों पर निवास करते हुए [क्षि निवासे] व यज्ञादि कर्मों में गतिवाले होते हुए [क्षि गतौ ] तथा इन यज्ञादि कर्मों के लिये सामग्री को जुटाने के लिये (अध्वन् आयान्तः) = मार्ग पर चारों ओर गति करते हुए, अर्थात् विविध कर्मों में लगे हुए (वः हूमहे) = आपको ही पुकारते हैं । [२] हे (देवा:) = दिव्य वृत्ति के पुरुषो! आप ही (वृधाय) = हमारी वृद्धि के लिये होते हो अथवा 'मित्र, वरुण व अर्यमा' आदि दिव्यभाव ही हमारी वृद्धि के लिये होते हैं।
Connotation: - भावार्थ - घर पर यज्ञादि कर्मों के लिये निवास करते हुए तथा साधन संग्रह के लिये मार्गों पर चलते हुए हम देवों का आह्वान करते हैं। इनका रक्षण ही हमारी वृद्धि के लिये होता है।