Word-Meaning: - [१] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! (इयं) = यह (ते) = आपकी (नव्यासी) = अतिशयेन (प्रशस्य मतिः) = मननपूर्वक की गई स्तुति (अस्मद्) = हमारे में [अस्मासु ] (आ अधायि) = सर्वथा निहित होती है। हम सदा आपका स्मरण करते हैं। [२] हे (मन्द्र) = आनन्दमय, (सुजात) = सर्वत्र शुभ को जन्म देनेवाले, (सुक्रतो) = शोमन प्रज्ञान व शक्तिवाले, (अमूर) = अमूढ़ - सब मूढ़ताओं को नष्ट करनेवाले, (दस्म) = दर्शनीय अथवा सब बुराइयों का उपक्षय करनेवाले (अतिथे) = सतत गमनशील प्रभो! आपका स्तवन हम सदा करते हैं। आपका 'मन्द्र' आदि शब्दों से स्तवन करते हुए वैसा ही बनने का प्रयत्न करते हैं। [क] हम अपने जीवनों में उत्तम बातों का विकास करते हुए आनन्दमय बनने का प्रयत्न करते हैं । [ख] मूढ़ न बनकर शोभन प्रज्ञान व शक्ति के सम्पादन के लिए यत्नशील होते हैं तथा [ग] निरन्तर क्रियाशील होते हुए सब बुराइयों का उपक्षय करते हैं।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रभु का स्तवन करें-प्रभु जैसा ही बनने का यत्न करें। उत्तम विकास द्वारा आनन्द को, विषयों के प्रति न मूढ़ बनकर शोभन शक्ति व प्रज्ञान को तथा निरन्तर क्रियाशील बनकर वासनाविलय को प्राप्त करें।