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इ॒यं ते॒ नव्य॑सी म॒तिरग्ने॒ अधा॑य्य॒स्मदा । मन्द्र॒ सुजा॑त॒ सुक्र॒तोऽमू॑र॒ दस्माति॑थे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

iyaṁ te navyasī matir agne adhāyy asmad ā | mandra sujāta sukrato mūra dasmātithe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒यम् । ते॒ । नव्य॑सी । म॒तिः । अग्ने॑ । अधा॑यि । अ॒स्मत् । आ । मन्द्र॑ । सुऽजा॑त । सुक्र॑तो॒ इति॒ सुऽक्र॑तो । अमू॑र । दस्म॑ । अति॑थे ॥ ८.७४.७

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:74» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:22» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:7


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे विज्ञानि जनो ! हम सब ही (वृत्रहन्तमम्) निखिल विघ्नों और उपद्रवों को विनष्ट करनेवाले (ज्येष्ठम्) ज्येष्ठ (आनवम्) मनुष्यहितकारी (अग्निम्) सर्वाधार जगदीश की ओर (आगन्म) जाएँ। (यस्य+अनीके) जिसकी शरण में रहते हुए (श्रुतर्वा) श्रोतृजन और (बृहन्) महान् जन और (आर्क्षः) मनुष्यहितकारी (एधते) इस जगत् में उन्नति कर रहे हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - श्रुतर्वा=जो ईश्वर की आज्ञाओं को सदा सुना करते हैं और उनपर चलते हैं। आर्क्ष=ऋक्षमित्र। यहाँ ऋक्ष शब्द मनुष्यवाची है ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नव्यसी मतिः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! (इयं) = यह (ते) = आपकी (नव्यासी) = अतिशयेन (प्रशस्य मतिः) = मननपूर्वक की गई स्तुति (अस्मद्) = हमारे में [अस्मासु ] (आ अधायि) = सर्वथा निहित होती है। हम सदा आपका स्मरण करते हैं। [२] हे (मन्द्र) = आनन्दमय, (सुजात) = सर्वत्र शुभ को जन्म देनेवाले, (सुक्रतो) = शोमन प्रज्ञान व शक्तिवाले, (अमूर) = अमूढ़ - सब मूढ़ताओं को नष्ट करनेवाले, (दस्म) = दर्शनीय अथवा सब बुराइयों का उपक्षय करनेवाले (अतिथे) = सतत गमनशील प्रभो! आपका स्तवन हम सदा करते हैं। आपका 'मन्द्र' आदि शब्दों से स्तवन करते हुए वैसा ही बनने का प्रयत्न करते हैं। [क] हम अपने जीवनों में उत्तम बातों का विकास करते हुए आनन्दमय बनने का प्रयत्न करते हैं । [ख] मूढ़ न बनकर शोभन प्रज्ञान व शक्ति के सम्पादन के लिए यत्नशील होते हैं तथा [ग] निरन्तर क्रियाशील होते हुए सब बुराइयों का उपक्षय करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का स्तवन करें-प्रभु जैसा ही बनने का यत्न करें। उत्तम विकास द्वारा आनन्द को, विषयों के प्रति न मूढ़ बनकर शोभन शक्ति व प्रज्ञान को तथा निरन्तर क्रियाशील बनकर वासनाविलय को प्राप्त करें।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - वृत्रहन्तमम्=अतिशयेन वृत्राणां विघ्नानां हन्तारम्। ज्येष्ठम्। आनवम्=मनुष्यमित्रम्। अनुरिति मनुष्यनाम। अग्निं=सर्वाधारम्। आगन्म=अभिमुखं गच्छेम। यस्य+अनीके=कृपया विद्यमानः। श्रुतर्वा=श्रोतृजनः। बृहन्=महान्। आर्क्षः=मनुष्यहितकारी च। एधते=वर्धते ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of light blissful, gloriously manifested, holy and divine in action, wise, majestic and revered as an honourable guest, this adorable light of your wisdom, we pray, may be vested in us.