Go To Mantra
Viewed 468 times

स॒त्यमित्त्वा॑ महेनदि॒ परु॒ष्ण्यव॑ देदिशम् । नेमा॑पो अश्व॒दात॑र॒: शवि॑ष्ठादस्ति॒ मर्त्य॑: ॥

English Transliteration

satyam it tvā mahenadi paruṣṇy ava dediśam | nem āpo aśvadātaraḥ śaviṣṭhād asti martyaḥ ||

Mantra Audio
Pad Path

स॒त्यम् । इत् । त्वा॒ । म॒हे॒ऽन॒दि॒ । परु॑ष्णि । अव॑ । दे॒दि॒श॒म् । न । ई॒म् । आ॒पः॒ । अ॒श्व॒ऽदात॑रः । शवि॑ष्ठात् । अ॒स्ति॒ । मर्त्यः॑ ॥ ८.७४.१५

Rigveda » Mandal:8» Sukta:74» Mantra:15 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:23» Mantra:5 | Mandal:8» Anuvak:8» Mantra:15


SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - (सबाधः) नाना रोगशोकादिसहित (जनासः) मनुष्यगण (यं+त्वा) जिस तुझको (वाजसातये) ज्ञान और धनादिकों के लाभ के लिये (ईळते) स्तुति करते हैं, (सः) वह तू (वृत्रतूर्ये) निखिल विघ्नविनाश के कार्य्य के लिये (बोधि) हम लोगों की प्रार्थना सुन ॥१२॥
Connotation: - जिस कारण मानवजाति रोगशोकादि अनेक उपद्रवों से युक्त है, अतः उन सबकी निवृत्ति के लिये ईश्वर से प्रार्थना करें ॥१२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

महेनदी, परुष्णी

Word-Meaning: - [१] हे (महेनदि) = अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करनेवाली और इसप्रकार (परुष्ण) = हमारा पालन व पूरण करने वाली बुद्धि ! (सत्यम् इत्) = सचमुच ही (त्वा) = तुझे (अवदेदिशम्) = मैं इस विषयवासनामय संसार से परे प्रेरित करता हूँ [Direct, order, command] । [२] हे (आपः) = प्रजाओ ! (न ईम्) = नहीं ही निश्चय से (शविष्ठात्) = उस शक्तिशाली प्रभु को छोड़कर कोई अन्य (मर्त्यः) = मनुष्य (अश्व-दा-तरः अस्ति) = उत्कृष्ट इन्द्रियाश्वों को देनेवाला है। प्रभु ही इन इन्द्रियाश्वों को प्राप्त कराते हैं-हमारी बुद्धि इन्हें प्रभु की ओर ही ले चलनेवाली हो । बुद्धि ही तो सारथि है। मैं रथी इसे इस रथ को प्रभु की ओर ले चलने के लिए निर्देश करता हूँ।
Connotation: - भावार्थ- हमारी बुद्धि इन्द्रियाश्वों को प्रभु की ओर ले चलनेवाली हो। यह बुद्धि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करनेवाली है तथा हमारा पालन व पुरण करनेवाली है। गतमन्त्र के अनुसार प्रभु की ओर चलनेवाला यह व्यक्ति 'विरूप' = विशिष्ट रूपवाला बनता है। यह 'अग्नि' नाम से प्रभु का स्मरण करता है-

SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - सबाधः=बाधोपेताः। जनासः=जनाः। यं+त्वा=यं त्वाम्। वाजसातये=ज्ञानान्नादिलाभाय। ईळते=स्तुवन्ति। स त्वम्। वृत्रतूर्ये=विघ्नानां विनाशनिमित्ते कार्ये। बोधि=जानीहि ॥१२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O divine powers of light and vitality of perception and imagination, generous and overflowing with spirit and enthusiasm, I say this true of you and to you and of and to the dynamics of cosmic intelligence, there is no mortal power which is a greater giver of bliss and joy than the most potent and most brilliant Agni.