पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (महेनदि) = अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करनेवाली और इसप्रकार (परुष्ण) = हमारा पालन व पूरण करने वाली बुद्धि ! (सत्यम् इत्) = सचमुच ही (त्वा) = तुझे (अवदेदिशम्) = मैं इस विषयवासनामय संसार से परे प्रेरित करता हूँ [Direct, order, command] । [२] हे (आपः) = प्रजाओ ! (न ईम्) = नहीं ही निश्चय से (शविष्ठात्) = उस शक्तिशाली प्रभु को छोड़कर कोई अन्य (मर्त्यः) = मनुष्य (अश्व-दा-तरः अस्ति) = उत्कृष्ट इन्द्रियाश्वों को देनेवाला है। प्रभु ही इन इन्द्रियाश्वों को प्राप्त कराते हैं-हमारी बुद्धि इन्हें प्रभु की ओर ही ले चलनेवाली हो । बुद्धि ही तो सारथि है। मैं रथी इसे इस रथ को प्रभु की ओर ले चलने के लिए निर्देश करता हूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारी बुद्धि इन्द्रियाश्वों को प्रभु की ओर ले चलनेवाली हो। यह बुद्धि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करनेवाली है तथा हमारा पालन व पुरण करनेवाली है। गतमन्त्र के अनुसार प्रभु की ओर चलनेवाला यह व्यक्ति 'विरूप' = विशिष्ट रूपवाला बनता है। यह 'अग्नि' नाम से प्रभु का स्मरण करता है-