Word-Meaning: - [१] हे (कृष्टयः) = श्रमशील मनुष्यो ! उस प्रभु का तुम स्तवन करो जो (इत्) = निश्चय से (अश्वम्) = [अश्नुते ] सब लोक-लोकान्तरों को व्याप्त किये हुए हैं। (गाम्) = [ गमयति अर्थान् ] हृदयस्थरूपेण सब पदार्थों का ज्ञान देनेवाले हैं। (रथप्राम्) = हमारे शरीररूप रथों का पूरण करनेवाले हैं। (त्वेषं) = दीप्त हैं तथा (इन्द्रं न) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले के समान (सत्पतिम्) = अच्छाइयों के रक्षक हैं। (२) हे मनुष्यो ! उस प्रभु का परिचरण करो, (यस्य) = जिसके (श्रवांसि) = ज्ञानों को तुम (तूर्वथ) = अपने अन्दर सुरक्षित करते हो (च) = और (पन्यम् पन्यम्) = प्रत्येक स्तुत्य वस्तु को अपने अन्दर सुरक्षित करते हो। प्रभुस्तवन के द्वारा हम प्रभु के गुणों को अपने अन्दर धारण करनेवाले बनते हैं।
Connotation: - भावार्थ- वे प्रभु व्यापक, ज्ञान को देनेवाले, शरीरों का पूरण करनेवाले व शत्रुओं का विद्रावण करके अच्छाइयों का रक्षण करनेवाले हैं। प्रभु ज्ञान व स्तुत्य गुणों को प्राप्त कराते हैं।