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अश्व॒मिद्गां र॑थ॒प्रां त्वे॒षमिन्द्रं॒ न सत्प॑तिम् । यस्य॒ श्रवां॑सि॒ तूर्व॑थ॒ पन्य॑म्पन्यं च कृ॒ष्टय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aśvam id gāṁ rathaprāṁ tveṣam indraṁ na satpatim | yasya śravāṁsi tūrvatha panyam-panyaṁ ca kṛṣṭayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अश्व॑म् । इत् । गाम् । र॒थ॒ऽप्राम् । त्वे॒षम् । इन्द्र॑म् । न । सत्ऽप॑तिम् । यस्य॑ । श्रवां॑सि । तूर्व॑थ । पन्य॑म्ऽपन्यम् । च॒ । कृ॒ष्टयः॑ ॥ ८.७४.१०

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:74» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:22» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:10


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्द्र) हे जीवों के आनन्दकर (सुजात) हे परम विख्यात (सुक्रतो) हे जगत्स्रजनादि शुभकर्मकारक (अमूर) सर्वज्ञानमय (दस्म) सर्वविघ्नविनाशक (अतिथे) हे अतिथिवत् पूज्य (अग्ने) हे सर्वाधार भगवन् ! (ते) आपने अपनी कृपा से (अस्मत्) हम लोगों में (इयं) यह (नव्यसी) नवीनतर (मतिः) कल्याणाबुद्धि (आ+अधायि) स्थापित की है, जिससे हम लोग आपकी स्तुति करते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - जो सदा ईश्वर की आज्ञा पर चलते हैं, उनको परमात्मा सुबुद्धि देते हैं, जिससे वे कभी विपत्तिग्रस्त नहीं होते ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पन्यं पन्यम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (कृष्टयः) = श्रमशील मनुष्यो ! उस प्रभु का तुम स्तवन करो जो (इत्) = निश्चय से (अश्वम्) = [अश्नुते ] सब लोक-लोकान्तरों को व्याप्त किये हुए हैं। (गाम्) = [ गमयति अर्थान् ] हृदयस्थरूपेण सब पदार्थों का ज्ञान देनेवाले हैं। (रथप्राम्) = हमारे शरीररूप रथों का पूरण करनेवाले हैं। (त्वेषं) = दीप्त हैं तथा (इन्द्रं न) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले के समान (सत्पतिम्) = अच्छाइयों के रक्षक हैं। (२) हे मनुष्यो ! उस प्रभु का परिचरण करो, (यस्य) = जिसके (श्रवांसि) = ज्ञानों को तुम (तूर्वथ) = अपने अन्दर सुरक्षित करते हो (च) = और (पन्यम् पन्यम्) = प्रत्येक स्तुत्य वस्तु को अपने अन्दर सुरक्षित करते हो। प्रभुस्तवन के द्वारा हम प्रभु के गुणों को अपने अन्दर धारण करनेवाले बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वे प्रभु व्यापक, ज्ञान को देनेवाले, शरीरों का पूरण करनेवाले व शत्रुओं का विद्रावण करके अच्छाइयों का रक्षण करनेवाले हैं। प्रभु ज्ञान व स्तुत्य गुणों को प्राप्त कराते हैं।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मन्द्र=जीवानन्दकर ! हे सुजात=विख्यात ! हे सुक्रतो=सुकर्मन् ! हे अमूर=सर्वज्ञानमय ! हे दस्म=समस्तविघ्नविनाशक ! हे अतिथे=अतिथिवत् पूज्य ! हे अग्ने=सर्वाधार ईश ! ते=तव कृपया। अस्मत्=अस्मासु। इयं नव्यसी=नव्यतरा। मतिः+आ+अधायि=स्थापिता यया वयं त्वां स्तुमः ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Adore Agni who gives us the wealth of earth and progressive achievement by chariotfuls of glory. Worship him, awfully brilliant, saviour and protector of the good and truthful like Indra, whose renowned victories and astonishing gifts people praise and celebrate one by one, one after another.