Word-Meaning: - [१] गतमन्त्र में वर्णित [सुदेव काण्वायन] (आत् इत्) = अब शीघ्र ही (साप्तस्य) = [ सप्] उस पूजनीय व सर्वत्र प्राप्त (आ अनूनस्य) = सब प्रकार से कमियों से रहित उस पूर्ण प्रभु के (महि श्रवः) = महान् यश को (चर्किरन्) = करते हैं। [२] उस प्रभु का यशोगान करते हुए ये व्यक्ति (श्यावीः पथः) = कुकर्म मार्गों को राजस व तामस मार्गों को (अतिध्वसन्) = नष्ट करते हैं। सदा सात्त्विक मार्गों का ही आक्रमण करते हैं। यह प्रभु का यशोगान करता हुआ सात्त्विक मार्ग से चलनेवाला व्यक्ति (चक्षुषा चन) = आँख से भी (सनशे) = उस प्रभु को प्राप्त करता है-अर्थात् आँख से सर्वत्र उस प्रभु की महिमा को देखता है।
Connotation: - भावार्थ- हम उस सर्वत्र प्राप्त अन्यून प्रभु का गायन करें। सात्त्विक मार्गों से चलते हुए प्रभु की महिमा को सर्वत्र देखें। सात्त्विक मार्ग से चलनेवाला यह व्यक्ति धन की आसक्ति से ऊपर उठा होने के कारण धन का वर्षण करता हुआ सबका धारण करनेवाला बनता है सो 'पृषध्र' है। समझदार होने से यह ' काण्व' है। यह दान की महिमा का वर्णन करता हुआ कहता है-