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आदित्सा॒प्तस्य॑ चर्किर॒न्नानू॑नस्य॒ महि॒ श्रव॑: । श्यावी॑रतिध्व॒सन्प॒थश्चक्षु॑षा च॒न सं॒नशे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ād it sāptasya carkirann ānūnasya mahi śravaḥ | śyāvīr atidhvasan pathaś cakṣuṣā cana saṁnaśe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आत् । इत् । सा॒प्तस्य॑ । च॒र्कि॒र॒न् । न । अनू॑नस्य । महि॑ । श्रवः॑ । श्यावीः॑ । अ॒ति॒ऽध्व॒सन् । प॒थः । चक्षु॑षा । च॒न । स॒म्ऽनशे॑ ॥ ८.५५.५

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:55» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:26» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:5


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'साप्त अनून' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गतमन्त्र में वर्णित [सुदेव काण्वायन] (आत् इत्) = अब शीघ्र ही (साप्तस्य) = [ सप्] उस पूजनीय व सर्वत्र प्राप्त (आ अनूनस्य) = सब प्रकार से कमियों से रहित उस पूर्ण प्रभु के (महि श्रवः) = महान् यश को (चर्किरन्) = करते हैं। [२] उस प्रभु का यशोगान करते हुए ये व्यक्ति (श्यावीः पथः) = कुकर्म मार्गों को राजस व तामस मार्गों को (अतिध्वसन्) = नष्ट करते हैं। सदा सात्त्विक मार्गों का ही आक्रमण करते हैं। यह प्रभु का यशोगान करता हुआ सात्त्विक मार्ग से चलनेवाला व्यक्ति (चक्षुषा चन) = आँख से भी (सनशे) = उस प्रभु को प्राप्त करता है-अर्थात् आँख से सर्वत्र उस प्रभु की महिमा को देखता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उस सर्वत्र प्राप्त अन्यून प्रभु का गायन करें। सात्त्विक मार्गों से चलते हुए प्रभु की महिमा को सर्वत्र देखें। सात्त्विक मार्ग से चलनेवाला यह व्यक्ति धन की आसक्ति से ऊपर उठा होने के कारण धन का वर्षण करता हुआ सबका धारण करनेवाला बनता है सो 'पृषध्र' है। समझदार होने से यह ' काण्व' है। यह दान की महिमा का वर्णन करता हुआ कहता है-

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And then do honour to the greatness and glory of the perfect lord of sevenfold world of existence, Indra. The man who can cross through the darkest paths of life can see and attain to the lord even through his own eyes.