Go To Mantra
Viewed 427 times

यथो॒त कृत्व्ये॒ धनें॒ऽशुं गोष्व॒गस्त्य॑म् । यथा॒ वाजे॑षु॒ सोभ॑रिम् ॥

English Transliteration

yathota kṛtvye dhane ṁśuṁ goṣv agastyam | yathā vājeṣu sobharim ||

Pad Path

यथा॑ । उ॒त । कृत्व्ये॑ । धने॑ । अं॒शुम् । गोषु॑ । अ॒गस्त्य॑म् । यथा॑ । वाजे॑षु । सोभ॑रिम् ॥ ८.५.२६

Rigveda » Mandal:8» Sukta:5» Mantra:26 | Ashtak:5» Adhyay:8» Varga:6» Mantra:1 | Mandal:8» Anuvak:1» Mantra:26


SHIV SHANKAR SHARMA

राजा को सबकी रक्षा करनी चाहिये, यह उपदेश इससे देते हैं।

Word-Meaning: - हे राजन् तथा मन्त्रिमण्डल आप (यथा) जैसे (धने+कृत्व्ये) धन के लिये (अंशुम्) पृथिवी के भिन्न-भिन्न भाग को अथवा जिसको भूमि का एक-२ टुकड़ा मिला है, ऐसे ज़मींदार को बचाते हैं। जैसे (गोषु) गवादि पशुओं के लिये (अगस्त्यम्) पर्वतादिकों को बचाते हैं (यथा) जैसे (वाजेषु) विज्ञान के अभ्युदय के लिये (सोभरिम्) यन्त्रादिकला की रक्षा करते हैं, तद्वत् हमारी भी रक्षा कीजिये ॥२६॥
Connotation: - कृषिबुद्धि के लिये भूभागों को, पश्वादिकों के लिये वनों को और विज्ञानादिकों के लिये विविधकलाओं को राजा बढ़ावे ॥२६॥

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यथा) जिस प्रकार (कृत्व्ये, धने) प्राप्तव्य धन के विषय में (अंशुं) अर्थशास्त्रवेत्ता की (गोषु) इन्द्रियों के विषय में (अगस्त्यम्) अगस्त्य=सदाचारी की (उत) और (यथा) जिस प्रकार (वाजेषु) यश के विषय में (सोभरिम्) सुन्दर पालन करनेवाले महर्षि की रक्षा की, उसी प्रकार हमारी रक्षा करें ॥२६॥
Connotation: - “धर्मादन्यत्र न गच्छन्तीत्यगस्तयः, तेषु साधुस्तं सदाचारिणम्”=जो धर्ममार्ग से अन्यत्र न जाए, उसको “अगस्ति” और अगस्ति में जो साधु है, उसको “अगस्त्य” कहते हैं। यहाँ “तत्र साधुः” इस पाणिनि-सूत्र से “यत्” प्रत्यय होता है, जिसके अर्थ सदाचारी के हैं अर्थात् जैसे अर्थवेत्ता, सदाचारी तथा महर्षि की आपने रक्षा की वा करते हैं, उसी प्रकार आप हमारी भी रक्षा करें, यह याज्ञिक पुरुषों की ओर से प्रार्थना है, “सोभरि” शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है कि “सु=सम्यक् हरत्यज्ञानमिति सोभरिः”=जो भले प्रकार अज्ञान का नाश करे, उसको “सोभरि” कहते हैं। यहाँ “हृग्रहोर्भश्छन्दसि” इस पाणिनि-सूत्र से “ह” को “भ” हो गया है ॥२६॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'अंशु-अगस्त्य-सोभरि'

Word-Meaning: - [१] (उत यथा) = और जैसे, हे प्राणापानो! आप (कृत्व्ये धने) = पुरुषार्थ से प्राप्त करने योग्य धन में (अंशुम्) = धनों का विभाग करनेवाले को रक्षित करते हो, इसी प्रकार (गोषु) = ज्ञान की वाणियों में (अगस्त्यम्) = [अगं अस्याति] अविद्या पर्वत को परे फेंकनेवाले को आप रक्षित करते हैं। [२] इन अंशु और अगस्त्य को उसी प्रकार रक्षित करते हैं, (यथा) = जैसे (वाजेषु) = शक्तियों में (सोभरिम्) = अपना उत्तमता से पोषण करनेवाले को आप रक्षित करते हैं।
Connotation: - भावार्थ- प्राणसाधना से [क] हम पुरुषार्थ से धनार्जन करके उस धन को विभक्त करनेवाले बनते हैं, [ख] अविद्या पर्वत को परे फेंकने के लिये हम सदा ज्ञान की वाणियों में चलते हैं, तथा [ग] शक्तियों का सम्पादन करते हुए अपना उत्तमता से भरण करते हैं।

SHIV SHANKAR SHARMA

राज्ञः सर्वरक्षा कर्तव्येत्युपदिशति।

Word-Meaning: - हे राजानौ ! उत=अन्यच्च। यथा=येन प्रकारेण। धने। कृत्व्ये=कर्तव्ये सति=धनार्थमिति यावत्। अंशुम्=पृथिव्यादिभागम्=भागकारिणं प्रजावर्गं वा रक्षथः। यथा। गोषु=गवादिपश्वर्थम्। अगस्त्यम्=पर्वतादिसमूहं रक्षथः। यथा। वाजेषु=विज्ञानेषु=विज्ञानार्थम्। सोभरिम्=यन्त्रादिकलां रक्षथस्तथैवास्मानपि रक्षतम् ॥२६॥

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (उत) अथ च (यथा) येन प्रकारेण (कृत्व्ये, धने) कर्तव्ये धने (अंशुं) अर्थशास्त्रवेत्तारं (गोषु) इन्द्रियाणां विषये (अगस्त्यम्) सदाचारिणम् (वाजेषु) यशस्सु च (सोभरिम्) सुपालकं महर्षिमरक्षतम्, तथैव मामपि ॥२६॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Come the way you protect and promote the earnest beginner in matters of possible success in business, the man of moral values in matters of self- control, and the man of charity and social awareness in matters of social success.