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इ॒मा जु॑षेथां॒ सव॑ना॒ येभि॑र्ह॒व्यान्यू॒हथु॑: । इन्द्रा॑ग्नी॒ आ ग॑तं नरा ॥

English Transliteration

imā juṣethāṁ savanā yebhir havyāny ūhathuḥ | indrāgnī ā gataṁ narā ||

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Pad Path

इ॒मा । जु॒षे॒था॒म् । सव॑ना । येभिः॑ । ह॒व्यानि॑ । ऊ॒हथुः॑ । इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑ । आ । ग॒त॒म् । न॒रा॒ ॥ ८.३८.५

Rigveda » Mandal:8» Sukta:38» Mantra:5 | Ashtak:6» Adhyay:3» Varga:20» Mantra:5 | Mandal:8» Anuvak:5» Mantra:5


SHIV SHANKAR SHARMA

पुनः उसी को कहते हैं।

Word-Meaning: - (इन्द्राग्नी+तस्य+बोधतम्) हे क्षत्रिय ! तथा हे ब्राह्मण ! यद्वा हे राजन् ! तथा दूत ! आप दोनों इस बात का पूरा ध्यान रक्खें कि आप दोनों (तोशासा) शत्रुसंहारक (रथयावाना) रथ पर चलनेवाले (वृत्रहणौ) निखिल विघ्नविनाशक और (अपराजिता) अपराजित=अन्यों से अजेय हैं ॥२॥
Connotation: - जिस हेतु ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों प्रत्येक प्रकार के विघ्नों के शमन करनेवाले हैं, अतः वे कभी न अपना अधिकार भूलें और न उससे प्रमाद करें ॥२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

जीवन के तीनों सवनों की सम्यक् पूर्ति

Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्राग्नी) = बल व प्रकाश के देवो! आप (इमा) = इन (सवना) = जीवन के तीनों सवनों की - प्रातः, मध्याह्न व तृतीय सवन की प्रथम २४ वर्ष [प्रातः सवन], मध्य के ४४ वर्ष [माध्यन्दिन सवन], अन्तिम ४८ वर्षों [तृतीय सवन] का (जुषेथाम्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करो। बल व प्रकाश के द्वारा हम जीवनयज्ञ के तीनों सवनों को पूरा कर पाएँ। [२] (येभिः) = जिन सवनों के उद्देश्य से (हव्यानि) = हव्य पदार्थों को (ऊहथुः) = आप धारण करते हो। हव्य [पवित्र] पदार्थों का सेवन करते हुए हम जीवन के तीनों सवनों को पूरा करें। हे (नरा) = हमें उन्नति पथ पर ले चलनेवाले इन्द्राग्नी ! आप (आगतम्) = हमें प्राप्त होवें ।
Connotation: - भावार्थ:-बल व प्रकाश के दिव्यभाव हमारे जीवनयज्ञ के तीनों सवनों को पूर्ण करें। उनकी पूत के हेतु से ये हव्य पदार्थों का सेवन करें।

SHIV SHANKAR SHARMA

पुनस्तदेवाह।

Word-Meaning: - हे इन्द्राग्नी=क्षत्रियब्राह्मणौ राजदूतौ वा। तस्य बोधतम्=तदेतज्जानीतम्। युवाम्। तोशासा=शत्रूणां हिंसकौ। पुनः रथयावाना=रथेन गन्तारौ। वृत्रहणौ=विघ्नविनाशकौ। अपराजिता=अपराजितौ ॥२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra and Agni, leaders of the nation’s enlightened rule and order, come, join the yajnic sessions of the social order and accept the holy offerings with the powers by which you reach out to the people and give them the facilities they need.