Word-Meaning: - [१] (सुते) सोम का सम्पादन होने पर (कः) = कोई विरल पुरुष ही (ईम्) = निश्चय से (सचा) = अपने साथ होनेवाले इस प्रभु को वेद-जानता है। ऐसे व्यक्ति विरल ही होते हैं जो संयमी जीवन बिताते हुए, सोमरक्षण द्वारा ज्ञानाग्नि को दीप्त करके प्रभु का दर्शन करते हैं। (पिबन्तम्) = सोम का पान करनेवाले को (कद्वयः) = आनन्दयुक्त जीवन दधे धारण करता है [कत्पयं] अर्थात् इस सोमरक्षक पुरुष का जीवन आनन्दमय होता है। [२] (अयम्) = यह (यः) = जो (ओजसा) = ओजस्विता के द्वारा (पुर: विभिनत्ति) = शत्रुओं की नगरियों को विदीर्ण कर देता है, काम-क्रोध-लोभ के किलों को तोड़ देता है, यह (अन्धसः) = इस सोम के द्वारा (मन्दान:) = आनन्द का अनुभव करता है। यह (शिप्री) = उत्तम हनु व नासिकाओंवाला बनता है। अर्थात् चबाकर खाता है और प्राणायाम को अपनाता है ।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण [क] हमें प्रभु-दर्शन के योग्य बनाता है, [ख] जीवन को आनन्दमय करता है। सो हम वासनाओं को विनष्ट करके, चबाकर खाते हुए तथा प्राणायाम करते हुए सोम का रक्षण करें।