वांछित मन्त्र चुनें
472 बार पढ़ा गया

क ईं॑ वेद सु॒ते सचा॒ पिब॑न्तं॒ कद्वयो॑ दधे । अ॒यं यः पुरो॑ विभि॒नत्त्योज॑सा मन्दा॒नः शि॒प्र्यन्ध॑सः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ka īṁ veda sute sacā pibantaṁ kad vayo dadhe | ayaṁ yaḥ puro vibhinatty ojasā mandānaḥ śipry andhasaḥ ||

पद पाठ

कः । ई॒म् । वे॒द॒ । सु॒ते । सचा॑ । पिब॑न्तम् । कत् । वयः॑ । द॒धे॒ । अ॒यम् । यः । पुरः॑ । वि॒ऽभि॒नत्ति॑ । ओज॑सा । म॒न्दा॒नः । शि॒प्री । अन्ध॑सः ॥ ८.३३.७

472 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:33» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:8» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:7


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमरक्षण के लाभ व साधन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सुते) सोम का सम्पादन होने पर (कः) = कोई विरल पुरुष ही (ईम्) = निश्चय से (सचा) = अपने साथ होनेवाले इस प्रभु को वेद-जानता है। ऐसे व्यक्ति विरल ही होते हैं जो संयमी जीवन बिताते हुए, सोमरक्षण द्वारा ज्ञानाग्नि को दीप्त करके प्रभु का दर्शन करते हैं। (पिबन्तम्) = सोम का पान करनेवाले को (कद्वयः) = आनन्दयुक्त जीवन दधे धारण करता है [कत्पयं] अर्थात् इस सोमरक्षक पुरुष का जीवन आनन्दमय होता है। [२] (अयम्) = यह (यः) = जो (ओजसा) = ओजस्विता के द्वारा (पुर: विभिनत्ति) = शत्रुओं की नगरियों को विदीर्ण कर देता है, काम-क्रोध-लोभ के किलों को तोड़ देता है, यह (अन्धसः) = इस सोम के द्वारा (मन्दान:) = आनन्द का अनुभव करता है। यह (शिप्री) = उत्तम हनु व नासिकाओंवाला बनता है। अर्थात् चबाकर खाता है और प्राणायाम को अपनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण [क] हमें प्रभु-दर्शन के योग्य बनाता है, [ख] जीवन को आनन्दमय करता है। सो हम वासनाओं को विनष्ट करके, चबाकर खाते हुए तथा प्राणायाम करते हुए सोम का रक्षण करें।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Who would for certain know Indra in this created world of beauty and glory, how much power and force he wields while he rules and sustains it, Indra who wears the helmet and breaks down the strongholds of negativities with his lustrous might, the lord who shares and enjoys the soma of his own creation?