Word-Meaning: - [१] (वरुणः) = द्वेष निवारण की देवता, (मित्रः) = स्नेह की देवता, (अर्यमा) = [ अरीन् यच्छति] काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुओं के नियमन की देवता, (स्मद् रातिषाचः) = शोभन [ स्मत् सुमत् राति, येषां तान् सचन्ते] दानवाले यज्ञशील पुरुषों के साथ सम्बद्ध (अग्नयः) = 'गार्हपत्य, आहवनीय व दक्षिणाग्नि' रूप अग्नियाँ। ये सब देव (पत्नीवन्तः) = पत्नियोंवाले होते हुए (वषट्कृताः) = हमारे से आदर दिये गये हैं, इनके प्रति हमने अपना अर्पण किया है। [२] देवों की शक्तियाँ ही देव पत्नियाँ हैं। इनके प्रति हम अपना अर्पण करें, इन्हें अपने में धारण करने के लिये यत्नशील हों। हम वरुण बनें, अर्थात् निर्देषता को धारण करें। हम मित्र बनें, स्नेह को धारण करें। अर्यमा बनते हुए काम- क्रोध-लोभ का नियमन करें। यज्ञशीलों को धनों को प्रदान करनेवाली यज्ञाग्नियों का सेवन करें। सब देवपत्त्रियों को आदर देनेवाले होते हुए इन देवों की शक्तियों को धारण करें।
Connotation: - भावार्थ- हम निर्दोष, स्नेही, शत्रुनियन्ता, यज्ञशील व देवशक्तियों को धारण करनेवाले बनें।