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अ॒क्ष्णश्चि॑द्गातु॒वित्त॑रानुल्ब॒णेन॒ चक्ष॑सा । नि चि॑न्मि॒षन्ता॑ निचि॒रा नि चि॑क्यतुः ॥

English Transliteration

akṣṇaś cid gātuvittarānulbaṇena cakṣasā | ni cin miṣantā nicirā ni cikyatuḥ ||

Pad Path

अ॒क्ष्णः । चि॒त् । गा॒तु॒वित्ऽत॑रा । अ॒नु॒ल्ब॒णेन॑ । चक्ष॑सा । नि । चि॒त् । मि॒षन्ता॑ । नि॒ऽचि॒रा । नि । चि॒क्य॒तुः॒ ॥ ८.२५.९

Rigveda » Mandal:8» Sukta:25» Mantra:9 | Ashtak:6» Adhyay:2» Varga:22» Mantra:4 | Mandal:8» Anuvak:4» Mantra:9


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SHIV SHANKAR SHARMA

उनके गुण दिखलाते हैं।

Word-Meaning: - पुनः वे मित्र और वरुण (अक्ष्णः+चित्) नेत्र से भी बढ़कर उत्तम (गातुवित्तरा) मार्गवेत्ता हों और (निमिषन्ता+चित्) सब वस्तुओं को उस समय भी देखते हों, जब वे स्वयं (निचिरा) आँखें बन्द रखते हैं अर्थात् ज्ञानचक्षु से सब पदार्थ देखें, चर्मचक्षु से नहीं, फिर (अनुल्वणेन) प्रसन्न (चक्षसा+नि+चिक्यतुः) नेत्र से सब कुछ निश्चय करें ॥९॥
Connotation: - वे दोनों सब वस्तु में बड़े ही तीक्ष्ण हों। शीघ्र मानवगति के परिचायक हों और प्रसन्न नयन से प्रजाओं को देखें ॥९॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सन्मार्गदर्शक 'मित्रावरुणौ'

Word-Meaning: - [१] ये मित्र और (वरुण) = स्नेह व निर्देषता के भाव (अक्ष्णः चित्) = आँखों से भी अधिक (गातुवित्तरा) = मार्ग को जाननेवाले हैं। स्नेह व निर्देषता ठीक ही मार्ग को दिखाते हैं। द्वेष में मनुष्य गलत सोचता है। [२] ये स्नेह व निर्देषता (अनुल्बणेन चक्षसा चित्) = न दुःसह तेजवाली सोम्य दृष्टि से ही अथवा (अनुरवण) = अदुःखद - वचनों से ही [चक्षु व्यक्तायां वाचि] (निमिषन्ता) = सब व्यवहारों को करते हैं। स्नेह व निर्देषता में कटुता का स्थान नहीं रहता। [३] ये स्नेह व निर्देषता (निचिरा) = नितरां चिरन्तन होते हुए, अर्थात् दीर्घायुष्यवाले होते हुए (निचिक्यतुः) = [पूजितौ बभूवतुः सा०] सत्कार के योग्य होते हैं। स्नेह व निर्देषता से दीर्घायुष्य प्राप्त होता है तथा जीवन सत्करणीय बनता है। लोग ऐसे जीवन को आदर की दृष्टि से देखते हैं।
Connotation: - भावार्थ- स्नेह व निर्देषता से [१] हमें जीवन का ठीक मार्ग दिखता है, [२] हमारे सब व्यवहार मधुर होते हैं, [३] दीर्घ सत्करणीय जीवन प्राप्त होता है।
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SHIV SHANKAR SHARMA

तयोर्गुणान् दर्शयति।

Word-Meaning: - पुनः। तौ मित्रावरुणौ। अक्ष्णः+चित्=नयनादपि। उत्तमौ। गातुवित्तरा=मार्गवेत्तारौ। पुनः। निमिषन्ता+चित्= सर्वमुन्मेषयन्तौ। निचिरा=निचिरौ=बद्धनयनौ। पुनः। अनुल्वणेन=प्रसन्नेन। चक्षसा=नेत्रेण। सर्वं निचिक्यतुः=नितरां चिनुतः ॥९॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - With open eyes and distant vision, they know and watch the paths of social development better than the eye itself and, ever alert and vigilant, they can perceive, judge and decide things in the twinkling of an eye.