'तपुर्जम्भस्य - सुद्युत्-गणश्री'
Word-Meaning: - [१] (अस्य) = गत मन्त्र में वर्णित (दीदियुषः) = ज्ञान-ज्योति से देदीप्यमान उपासक की (अजरम्) = न जीर्ण होनेवाली (शोचिः) = दीप्ति (वि उद् अस्थात्) = विशेषरूप से उत्थित होती है, यह उपासक 'स्वास्थ्य नैर्मल्य व बुद्धि की तीव्रता' के द्वारा जीवन में चमक उठता है। [२] उस उपासक की ज्योति चमक उठती है, जो (तपुर्जम्भस्य) = तपस्वी दंष्ट्रावाला है, अर्थात् जिसके दाँत खान-पान की क्रिया में अत्यन्त तपस्वी हैं। जो सात्त्विक भोजन को ही मात्रा में ग्रहण करता है। (सुद्युतः) = स्वाध्याय के द्वारा अत्यन्त द्युतिमय जीवनवाला बनता है। तथा (गणश्रियः) = जो शरीरस्थ सब गणों की शोभावाला है, जिसके पञ्चभूत, पञ्च प्राण, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ तथा अन्त:करण = पञ्चक [ मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, हृदय] सभी शोभा सम्पन्न हैं।
Connotation: - भावार्थ- हम तपस्वी दाँतोंवाले, स्वाध्यायशील व सब शरीरस्थ इन्द्रिय आदि के गणों को श्री- सम्पन्न बनानेवाले हों। हम स्थिर ज्योति से चमक उठेंगे।