प्र वो॑ म॒हे म॑हि॒वृधे॑ भरध्वं॒ प्रचे॑तसे॒ प्र सु॑म॒तिं कृ॑णुध्वम्। विशः॑ पू॒र्वीः प्र च॑रा चर्षणि॒प्राः ॥१०॥
pra vo mahe mahivṛdhe bharadhvam pracetase pra sumatiṁ kṛṇudhvam | viśaḥ pūrvīḥ pra carā carṣaṇiprāḥ ||
प्र। वः॒। म॒हे। म॒हि॒ऽवृधे॑। भ॒र॒ध्व॒म्। प्रऽचे॑तसे। प्र। सु॒ऽम॒तिम्। कृ॒णु॒ध्व॒म्। विशः॑। पू॒र्वीः। प्र। च॒र॒। च॒र्ष॒णि॒ऽप्राः ॥१०॥
SWAMI DAYANAND SARSWATI
फिर राजप्रजाजन परस्पर क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
ज्ञान प्राप्ति के उत्तमोत्तम साधन हों
SWAMI DAYANAND SARSWATI
पुना राजप्रजाजनाः परस्परं किं कुर्य्युरित्याह ॥
हे विद्वांसो ! यथा वयं वो युष्मभ्यमुत्तमान् पदार्थान् प्रयच्छेम तथा यूयं नो महे महिवृधे प्रचेतसे सुमतिं प्र भरध्वमस्मान् पूर्वीर्विशो विदुषीः प्र कृणुध्वम्। चर्षणिप्रास्त्वं राजँस्त्वं न्याये प्र चर ॥१०॥
DR. TULSI RAM
MATA SAVITA JOSHI
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