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यत्र॒ वह्नि॑र॒भिहि॑तो दु॒द्रव॒द्द्रोण्यः॑ प॒शुः। नृ॒मणा॑ वी॒रप॒स्त्योऽर्णा॒ धीरे॑व॒ सनि॑ता ॥४॥

English Transliteration

yatra vahnir abhihito dudravad droṇyaḥ paśuḥ | nṛmaṇā vīrapastyo rṇā dhīreva sanitā ||

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Pad Path

यत्र॑। वह्निः॑। अ॒भिऽहि॑तः। दु॒द्रव॑त्। द्रोण्यः॑। प॒शुः। नृ॒ऽमनाः॑। वी॒रऽप॑स्त्यः। अर्णा॑। धीरा॑ऽइव। सनि॑ता ॥४॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:50» Mantra:4 | Ashtak:4» Adhyay:3» Varga:4» Mantra:4 | Mandal:5» Anuvak:4» Mantra:4


SWAMI DAYANAND SARSWATI

जो अग्नि के सदृश व्यवहार के धारण करनेवाले होवें, वे धीर होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! (यत्र) जिसमें (द्रोण्यः) शीघ्र चलनेवालों में उत्पन्न (पशुः) जो देखा जाता है, उसके सदृश (अभिहितः) कहा गया वा धारण किया गया (वह्निः) प्राप्त करनेवाला अग्नि (दुद्रवत्) अत्यन्त चलता है, वहाँ (अर्णा) प्राप्त करानेवाली (धीरेव) ध्यानवती के सदृश (नृमणाः) मनुष्यों में जिसका मन (वीरपस्त्यः) जिसके गृह में वीर वह पुत्र (सनिता) विभाग करनेवाला होवे ॥४॥
Connotation: - इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो अग्नि के सदृश तेजस्वी और वेग से युक्त होवें, वे सत्य और असत्य के विभाग करनेवाले होवें ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

कैसा घर ?

Word-Meaning: - [१] (यत्र) = जहाँ (वह्निः) = यज्ञ की अग्नि (अभिहितः) = दिन में दोनों बार, प्रारम्भ व अन्त में प्रातः व सायं स्थापित हुई है। जिस घर में यज्ञ नियमपूर्वक होते हैं। [२] जहाँ (द्रोण्यः) = द्रोण भर दूध देनेवाले। [३२ सेर] (पशुः) = गवादिक पशु (दुद्रवत्) = खूब दौड़ता फिरता है। जहां उत्तम गौ स्वतन्त्रता से विचरती है। [३] (नृमणा) = जिसका मनुष्यों में मन है, अर्थात् जहाँ सब सन्तानों के निर्माण का पूरा ध्यान होता है। व्यर्थ की चीजों की जहाँ झुकाव नहीं। अतएव (वीरपस्त्यः) = जहाँ वीरों का ही निवास है। [४] (अर्णा) = अरण कुशल गति में कुशल, कर्मों को कुशलता से करनेवाली (धीरा इव) = एक धैर्यवाली स्त्री की तरह सब कोई (सनिता) = संभक्ता होता है, प्रभु का भजन करनेवाला व संविभागपूर्वक खानेवाला होता है।
Connotation: - भावार्थ - उत्तम घर वह है जहाँ कि [क] यज्ञ नियम से होता है, [ख] खूब दूध देनेवाला पशु [गौ] विद्यमान है, [ग] जहाँ मनुष्यों के निर्माण का ध्यान है, [घ] जहाँ सब वीर हैं, [ङ] और संविभागपूर्वक सब खाते हैं।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

ये वह्निवद्व्यवहारवोढारः स्युस्ते धीरा जायन्त इत्याह ॥

Anvay:

हे मनुष्या ! यत्र द्रोण्यः पशुरिवाऽभिहितो वह्निर्दुद्रवत् तत्रार्णा धीरेव नृमणा वीरपस्त्यस्तनयः सनिता भवेत् ॥४॥

Word-Meaning: - (यत्र) यस्मिन् (वह्निः) वोढाऽग्निः (अभिहितः) कथितो धृतो वा (दुद्रवत्) भृशं गच्छति (द्रोण्यः) द्रोणेषु शीघ्रगामिषु भवः (पशुः) यो दृश्यते (नृमणाः) नृषु मनो यस्य सः (वीरपस्त्यः) वीरा पस्त्ये गृहे यस्य सः (अर्णा) प्रापिका (धीरेव) ध्यानवतीव (सनिता) विभक्ता ॥४॥
Connotation: - अत्र [उपमा]वाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। येऽग्निवत्तेजस्विनो वेगवन्तो भवेयुस्ते सत्याऽसत्यविभाजका भवेयुः ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Where the fire, placed, invoked and kindled in the vedi rises in flames, where a fiery leader, elected, supported and enthused goes around watching and watched all round among a dynamic people, loving all and loved at heart by all, and where the homes abound with brave and brilliant youth, there the streams of prosperity flow deep and calm like inalienable partners of the nation.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

Who are conveyors of good dealings like the fire become men of preservant nature.

Anvay:

O men ! where the fire is stated to be running (acting rapidly) like a rapid-going animal, there the son becomes like a woman of meditative nature, conveying happiness, endowed with heroic progeny and is, capable to distinguish between truth and falsehood.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - Those who are full of splendour and impetuous like the fire become distinguishers between truth and untruth.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात उपमा व वाचकलुप्तोपमालंकार आहेत. जे अग्नीप्रमाणे तेजस्वी व वेगवान असतात त्यांनी सत्य असत्याचा भेद जाणावा. ॥ ४ ॥