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स॒मु॒द्रमा॑सा॒मव॑ तस्थे अग्रि॒मा न रि॑ष्यति॒ सव॑नं॒ यस्मि॒न्नाय॑ता। अत्रा॒ न हार्दि॑ क्रव॒णस्य॑ रेजते॒ यत्रा॑ म॒तिर्वि॒द्यते॑ पूत॒बन्ध॑नी ॥९॥

English Transliteration

samudram āsām ava tasthe agrimā na riṣyati savanaṁ yasminn āyatā | atrā na hārdi kravaṇasya rejate yatrā matir vidyate pūtabandhanī ||

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Pad Path

स॒मु॒द्रम्। आ॒सा॒म्। अव॑। त॒स्थे॒। अ॒ग्रि॒मा। न। रि॒ष्य॒ति॒। सव॑नम्। यस्मि॑न्। आऽय॑ता। अत्र॑। न। हार्दि॑। क्र॒व॒णस्य॑। रे॒ज॒ते॒। यत्र॑। म॒तिः। वि॒द्यते॑। पू॒त॒ऽबन्ध॑नी ॥९॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:44» Mantra:9 | Ashtak:4» Adhyay:2» Varga:24» Mantra:4 | Mandal:5» Anuvak:3» Mantra:9


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे विद्वन् ! (यस्मिन्) जिसमें (अग्रिमा) अतिश्रेष्ठ (सवनम्) ऐश्वर्य्य का (न) नहीं (रिष्यति) नाश करता है और (आसाम्) इन प्रजाओं के बीच (समुद्रम्) अन्तिरक्ष को (अव, तस्थे) स्थित होता है और (यत्रा) जहाँ (आयता) बहुत धनों की वृद्धि होती है और (पूतबन्धनी) पवित्र गुणों को ग्रहण करनेवाली (मतिः) बुद्धि (विद्यते) विद्यमान है (न) नहीं (अत्रा) इस में (क्रवणस्य) शब्द करनेवाले का (हार्दि) हृदयसम्बन्धी कार्य (रेजते) चलता है ॥९॥
Connotation: - जो प्रजाओं के मध्य में अन्तरिक्ष के सदृश सुखरूपी अवकाश देनेवाले और नहीं हिंसा करनेवाले बुद्धिमान् उपदेशक विद्यमान हैं, वे ही सुखयुक्त होते हैं ॥९॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

पूतबन्धनी मति

Word-Meaning: - [१] (आसाम्) = गतमन्त्र में संकेतित स्तुतियों में (अग्रिमा) = [अल्पेतं श्रेष्ठा] अतिशयेन श्रेष्ठ स्तुति (समुद्रम्) = उस आनन्दमय प्रभु के समीप (अवतस्थे) = स्थित होती है। (यस्मिन्) = जिस भी पुरुष में (आयता) = इस स्तुति का विस्तार होता है, उसमें (सवनम्) = यज्ञ (न रिष्यति) = हिंसित नहीं होता। अर्थात् प्रभु का स्तवन करनेवाला व्यक्ति सदा यज्ञशील होता है । वस्तुतः इन यज्ञादि कर्मों का करना ही सच्चा स्तवन होता है 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा:' । [२] (अत्रा) = इस स्तुति के होने पर (श्रवणस्य) = इस स्तुतिकर्ता का (हार्दि) = हृदयगत प्रभु प्राप्ति का भाव (न रेजते) = विचलित नहीं होता। इसे प्रभु प्राप्ति की कामना सदा बनी ही रहती है। (यत्रा) = जिस प्रभु प्राप्ति की कामना में (मतिः) = बुद्धि (पूतबन्धनी) = सदा पवित्र विचारों को अपने में बाँधनेवाली (विद्यते) = होती है। प्रभु प्राप्ति की कामना बनी रहने पर बुद्धि सदा पवित्र विचारों को ही करनेवाली होती है इसका झुकाव वैषयिक बातों की ओर नहीं रहता।
Connotation: - भावार्थ- हम सदा प्रभु स्तवन की वृत्तिवाले बनें। ऐसा बनने पर हम यज्ञों के प्रति रुचिवाले व बुद्धि से पवित्र विचारों को करनेवाले होंगे ।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

Anvay:

हे विद्वन् ! यस्मिन्नग्रिमा सवनं च न रिष्यत्यासां समुद्रमव तस्थे यत्रायता धनानि वर्धन्ते पूतबन्धनी मतिश्च विद्यते नात्रा क्रवणस्य हार्दि रेजते ॥९॥

Word-Meaning: - (समुद्रम्) अन्तरिक्षम् (आसाम्) प्रज्ञानाम् (अव) (तस्थे) अवतिष्ठते (अग्रिमा) अतिश्रेष्ठः (न) निषेधे (रिष्यति) हिनस्ति (सवनम्) ऐश्वर्य्यम् (यस्मिन्) (आयता) विस्तृतानि (अत्रा) अत्र ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (न) निषेधे (हार्दि) हृदयस्येदम् (क्रवणस्य) शब्दकर्त्तुः (रेजते) चलति (यत्रा) अत्रापि ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (मतिः) प्रज्ञा (विद्यते) (पूतबन्धनी) या पूतान् पवित्रान् गुणान् बध्नाति गृह्णाति सा ॥९॥
Connotation: - ये प्रजानां मध्येऽन्तरिक्षमिव सुखाऽवकाशदा अहिंस्रा धीमन्त उपदेशका विद्यन्ते त एव सुखयुक्ता भवन्ति ॥९॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The fame and advancement of these people resounds over seas and abides over spaces, nor does their yajnic progress suffer where hymns are chanted and wealth grows in holiness. Here the heart’s desire of the worshipper is not obstructed where holy intelligence and intentions abide for guidance in action.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The attributes and duties of the learned persons are stated.

Anvay:

O learned person ! the heartly action of the preacher does not shake where the sublime wealth does not decay (is in abundance. Ed.), where the firmament (heart) of the people stands firmly, where the vast riches ever grow and where the intellect grasps pure virtues.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - Those people only became happy who are bestowers of happiness among the people like the firmament, and who are non-violent and wise preachers.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - प्रजेमध्ये अंतरिक्षाप्रमाणे सुख देणारे, अहिंसक, बुद्धिमान, उपदेशक विद्यमान असतात तेच सदैव सुखी असतात. ॥ ९ ॥