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न यत्परो॒ नान्त॑र आद॒धर्ष॑द्वृषण्वसू। दुः॒शंसो॒ मर्त्यो॑ रि॒पुः॥

English Transliteration

na yat paro nāntara ādadharṣad vṛṣaṇvasū | duḥśaṁso martyo ripuḥ ||

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Pad Path

न। यत्। परः॑। न। अन्त॑रः। आ॒ऽद॒धर्ष॑त्। वृ॒ष॒ण्व॒सू॒ इति॑ वृषण्ऽवसू। दुः॒ऽशंसः॑। मर्त्यः॑। रि॒पुः॥

Rigveda » Mandal:2» Sukta:41» Mantra:8 | Ashtak:2» Adhyay:8» Varga:8» Mantra:3 | Mandal:2» Anuvak:4» Mantra:8


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को कहते हैं।

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! (परः) उत्कृष्ट (दुःशंसः) जिसकी दुष्ट स्तुति विद्यमान वह (मर्त्यः) मरणधर्मा मनुष्य (रिपुः) शत्रु (यत्) जो (वृषण्वसू) वर्षानेवालों को बसाते हैं उनको (न,आदधर्षत्) न लचावे वा (अन्तरः) सामान्य दुष्ट स्तुतिवाला मरणधर्मा जिनको (न) न लचावे उनको कार्यों में नियुक्त करो ॥८॥
Connotation: - इस जगत् में वायु और अग्नि को कोई भी लचाय नहीं सकता और न इनका कोई शत्रु के समान नाश करनेवाला है, उस प्रकार से नहीं पराजित होने योग्य मनुष्यों को होना चाहिये ॥८॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

अनभिभवनीय शरीरगृह

Word-Meaning: - १. गतमन्त्र के अनुसार हे (वृषण्वसू) = सब धनों का वर्षण करनेवाले-निवास के लिए आवश्यक सब वसुओं को प्राप्त करानेवाले प्राणापानो! आप हमें उस शरीरगृह को प्राप्त कराओ (यत्) = जिसका कि (न पर:) = न तो बाहर का (न आन्तरः) = और ना ही अन्दर का शत्रु (आदधर्षत्) = किसी प्रकार से धर्षण करनेवाला हो । मन में ही पैदा हो जाने वाले काम-क्रोध आदि आन्तर शत्रु हैं और बाहर से अन्दर घुसनेवाले रोग बाह्य शत्रु हैं। प्राणसाधना होने पर ये दोनों ही शरीर को आक्रान्त नहीं कर पाते। वशीभूत प्राणापान शरीर के रोगों को तथा मन की वासनाओं को विनष्ट करते हैं। २. यह हमारा शरीरगृह ऐसा हो कि दुःशंस:-अशुभ का शंसन करनेवाला (रिपुःमर्त्यः) = शत्रुभूत मनुष्य भी (न आदधर्षत् =) इसका धर्षण न कर पाए। प्राणसाधना से हमारा यह शरीर तेजस्वी बनता है और इन शत्रुओं से शातनीय [नष्ट करने योग्य] नहीं होता ।
Connotation: - भावार्थ- प्राणसाधना से हमारा शरीर काम-क्रोधादि से, रोगों से, तथा बाह्य-शत्रुओं से अभिभवनीय न हो ।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह।

Anvay:

हे मनुष्याः परो दुःशंसो मर्त्यो रिपुर्यद्यौ वृषण्वसू नादधर्षदन्तरो दुःशंसो मर्त्यो रिपुर्नादधर्षत्तौ कार्येषु नियुङ्ग्ध्वम् ॥८॥

Word-Meaning: - (न) (यत्) यौ (परः) (न) (अन्तरः) मध्यस्थः (आदधर्षत्) प्रगल्भो भवेत् (वृषण्वसू) वृष्णं वर्षयित्रीणां वासयितारौ (दुःशंसः) दुष्टः शंसस्तुतिर्यस्य सः (मर्त्यः) मरणधर्मा मनुष्यः (रिपुः) शत्रुः ॥८॥
Connotation: - अत्र जगति वायुं वह्निं च कोऽपि धर्षयितुं न शक्नोति नैवाऽनया कश्चिच्छत्रुवन्नाशकोऽस्ति तथाऽजेयैर्मनुष्यैर्भवितव्यम् ॥८॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Generous are the Ashvins’ showers of wealth, joy and protection, so strong that no mortal man, no maligner, no enemy internal or external, dare challenge, much less hurt, violate or surpass and overcome them. (Let us all abide by them.)

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

Significance of fire and air are emphasized.

Anvay:

O men ! no malevolent man or foe can overcome these mighty fire and air, whether be far off or nigh.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - In this world, none can subdue fire and air. There is none who can destroy them like an enemy. So men should be invincible.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या जगात वायू व अग्नीला कोणी पराभूत करू शकत नाही त्यांचा शत्रूप्रमाणे कोणी नाश करू शकत नाही. याप्रमाणे माणसांनीही पराभूत होता कामा नये. ॥ ८ ॥