Word-Meaning: - [१] (सुते) = [सुतं = सव:- यागः ] यज्ञों में तथा (अध्वरे) = हिंसारहित निर्माण के कार्यों में (वाचम्) = प्रभु की स्तुति वाणी को (अधि अक्रता) = आधिक्येन करनेवाले होते हैं। प्रभु का खूब ही स्मरण करते हैं, यह प्रभुस्मरण ही इन्हें इन यज्ञों व हिंसारहित कर्मों में सफलता के लिए शक्ति प्राप्त कराता हैं । [२] ये इन कार्यों को करते हुए (क्रीडय:) = क्रीड़ा करनेवाले होते हैं । सब कार्यों को क्रीड़क की मनोवृत्ति से करते हैं [sportsman like spirit]। यही तो दैवत्य है ['दिव् क्रीडायाम्'] । ये अपने व्यवहारों से (मातरम्) = वेदमाता को (न तुदन्तः) = पीड़ित नहीं करते। वेद के निर्देशों के अनुसार ही सब कार्यों को करनेवाले होते हैं। [३] इनकी आत्मप्रेरणा यही होती है कि (सुषुवुषः) = उस संसार को जन्म देनेवाले प्रभु की (मनीषाम्) = बुद्धि को (वि) = विशेषरूप से (सुमुञ्च) = [मुंच् put on ] अच्छी प्रकार धारण कर । प्रभु की दी हुई इस वेदवाणी के द्वारा ये अपनी बुद्धि का परिष्कार करते हैं। ऐसे ये (अद्रयः) = उपासक (चायमाना:) = [observe, see, discern] संसार को तात्विक दृष्टि से देखते हुए, इसकी आपातरम्यता में न उलझकर इसकी असलीयत को देखते हुए (वि वर्तन्ताम्) = विविध व्यवहारों में प्रवृत्त होते हैं। इनके सब व्यवहार आसक्ति से ऊपर उठकर होते हैँ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु का स्मरण करें, क्रीड़क की मनोवृत्ति को अपनाकर वेदानुसार क्रियाओं में प्रवृत्त हों । प्रभु की बुद्धि को धारण करें। संसार को तात्विक दृष्टि से देखते हुए कार्यों को करें। सम्पूर्ण सूक्त 'प्रभु स्मरण के साथ क्रियाओं को करने' की भावना से ओतप्रोत है। इसी प्रकार हम वासनाओं का संहार करनेवाले 'अर्बुद' बनते हैं, प्रभु को पुकारनेवाले 'काद्रवेय' होते हुए, निरन्तर क्रियाशील ‘सर्प' होते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति ही गृहस्थ होने पर 'पुरुरवा ऐड' व 'उर्वशी' होते हैं । पुरुरवा: - खूब ही प्रभु के स्तुति वचनों का उच्चारण करनेवाला, ऐड- [इडाया: अयम्] = वेदवाणी को अपनानेवाला अथवा [ इडा = अन्न] अन्न को जुटानेवाला। पति को अन्न जुटानेवाला होना ही चाहिए। पत्नी 'उर्वशी' है 'उरु वशोयस्या: 'अपने पर खूब काबू पानेवाली और अतएव घर पर पूर्ण नियन्त्रण रखनेवाली । इसीलिए तो पत्नी 'साम्राज्ञी' है। अगला सूक्त इन्हीं का है। पहले 'पुरुरवा' कहते हैं-