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सु॒ते अ॑ध्व॒रे अधि॒ वाच॑मक्र॒ता क्री॒ळयो॒ न मा॒तरं॑ तु॒दन्त॑: । वि षू मु॑ञ्चा सुषु॒वुषो॑ मनी॒षां वि व॑र्तन्ता॒मद्र॑य॒श्चाय॑मानाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sute adhvare adhi vācam akratā krīḻayo na mātaraṁ tudantaḥ | vi ṣū muñcā suṣuvuṣo manīṣāṁ vi vartantām adrayaś cāyamānāḥ ||

पद पाठ

सु॒ते । अ॒ध्व॒रे । अधि॑ । वाच॑म् । अ॒क्र॒त॒ । आ । क्री॒ळयः॑ । न । मा॒तर॑म् । तु॒दन्तः॑ । वि । सु । मु॒ञ्च॒ । सु॒सु॒ऽवुषः॑ । म॒नी॒षाम् । वि । व॒र्त॒न्ता॒म् । अद्र॑यः । चाय॑मानाः ॥ १०.९४.१४

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:94» मन्त्र:14 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:31» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:14


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (चायमानाः) पूजा के योग्य विद्वान् (अद्रयः) मन्त्रप्रवचनकर्त्ता महानुभाव (अध्वरे सुते-अधि) अहिंसक अध्यात्मयज्ञ सम्पन्न होने के निमित्त (वाचम्-अक्रत) परमात्मा की स्तुति करते हैं (क्रीळयः-न) क्रीड़ाशील शिशुओं-छोटे बच्चों की भाँति (मातरं तुदन्तः) दूध पीने के लिये माता को प्रेरित करते हुए (वि वर्त्तन्ताम्) परमात्मा को विशेषरूप से अपने अन्दर सेवन करते हैं (सुषुवुषः) वे परमात्मा के उपासक (मनीषाम्) जगदुत्पादक परमात्मा की स्तुति को (सु विमुञ्च) भली-भाँति समर्पित करते हैं ॥१४॥
भावार्थभाषाः - पूजनीय मन्त्रप्रवचन करनेवाले परमात्मा को स्तुति द्वारा प्रेरित करते हैं कि वह अपने आनन्दरस को उन्हें पान कराये, जैसा कि छोटे बच्चे दुग्धपान के लिए  माता को प्रेरित करते हैं। परमात्मा की स्तुति इसलिए भी करनी चाहिये कि परमात्मा को अपने अन्दर धारण कर लिया जावे ॥१४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अद्रयः चायमानाः'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सुते) = [सुतं = सव:- यागः ] यज्ञों में तथा (अध्वरे) = हिंसारहित निर्माण के कार्यों में (वाचम्) = प्रभु की स्तुति वाणी को (अधि अक्रता) = आधिक्येन करनेवाले होते हैं। प्रभु का खूब ही स्मरण करते हैं, यह प्रभुस्मरण ही इन्हें इन यज्ञों व हिंसारहित कर्मों में सफलता के लिए शक्ति प्राप्त कराता हैं । [२] ये इन कार्यों को करते हुए (क्रीडय:) = क्रीड़ा करनेवाले होते हैं । सब कार्यों को क्रीड़क की मनोवृत्ति से करते हैं [sportsman like spirit]। यही तो दैवत्य है ['दिव् क्रीडायाम्'] । ये अपने व्यवहारों से (मातरम्) = वेदमाता को (न तुदन्तः) = पीड़ित नहीं करते। वेद के निर्देशों के अनुसार ही सब कार्यों को करनेवाले होते हैं। [३] इनकी आत्मप्रेरणा यही होती है कि (सुषुवुषः) = उस संसार को जन्म देनेवाले प्रभु की (मनीषाम्) = बुद्धि को (वि) = विशेषरूप से (सुमुञ्च) = [मुंच् put on ] अच्छी प्रकार धारण कर । प्रभु की दी हुई इस वेदवाणी के द्वारा ये अपनी बुद्धि का परिष्कार करते हैं। ऐसे ये (अद्रयः) = उपासक (चायमाना:) = [observe, see, discern] संसार को तात्विक दृष्टि से देखते हुए, इसकी आपातरम्यता में न उलझकर इसकी असलीयत को देखते हुए (वि वर्तन्ताम्) = विविध व्यवहारों में प्रवृत्त होते हैं। इनके सब व्यवहार आसक्ति से ऊपर उठकर होते हैँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु का स्मरण करें, क्रीड़क की मनोवृत्ति को अपनाकर वेदानुसार क्रियाओं में प्रवृत्त हों । प्रभु की बुद्धि को धारण करें। संसार को तात्विक दृष्टि से देखते हुए कार्यों को करें। सम्पूर्ण सूक्त 'प्रभु स्मरण के साथ क्रियाओं को करने' की भावना से ओतप्रोत है। इसी प्रकार हम वासनाओं का संहार करनेवाले 'अर्बुद' बनते हैं, प्रभु को पुकारनेवाले 'काद्रवेय' होते हुए, निरन्तर क्रियाशील ‘सर्प' होते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति ही गृहस्थ होने पर 'पुरुरवा ऐड' व 'उर्वशी' होते हैं । पुरुरवा: - खूब ही प्रभु के स्तुति वचनों का उच्चारण करनेवाला, ऐड- [इडाया: अयम्] = वेदवाणी को अपनानेवाला अथवा [ इडा = अन्न] अन्न को जुटानेवाला। पति को अन्न जुटानेवाला होना ही चाहिए। पत्नी 'उर्वशी' है 'उरु वशोयस्या: 'अपने पर खूब काबू पानेवाली और अतएव घर पर पूर्ण नियन्त्रण रखनेवाली । इसीलिए तो पत्नी 'साम्राज्ञी' है। अगला सूक्त इन्हीं का है। पहले 'पुरुरवा' कहते हैं-

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (चायमानाः-अद्रयः) पूज्यमानाः “चायृ पूजानिशामनयो” [भ्वादिः०] मन्त्रप्रवचनकर्त्तारः (अध्वरे सुते-अधि) अहिंसकेऽध्यात्मयज्ञे सम्पन्ने तन्निमित्तं (वाचम्-अक्रत) परमात्मनः स्तुतिवाचं कुर्वति-ब्रुवन्ति (क्रीळयः-न मातरं तुदन्तः) यथा क्रीडाशीलाः शिशवो दुग्धं पातुं मातरं प्रेरयन्तः “अत्र तुद् धातुर्न व्यथनेऽर्थे निरुक्ते “तोदः-तुद्यते” [निरु०५।८] दिवादिरूपदर्शनात् प्रेरणार्थे वर्त्तते, “तोदः-प्रेरणसाधनम्” पठनाच्च तद्वत् तेऽपि (विवर्तन्ताम्) परमात्मनि विशेषेण वर्त्तन्ते अतः (सुषुवुषः-मनीषां सु विमुञ्च) ते परमात्मन उपासकाः तस्य स्तुतिं प्रशंसां समर्पयन्ति ॥१४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as children in love vex the mother while playing, so when the yajna is on and soma is extracted, let the sages recite the hymns with love and a sense of freedom and release in spontaneity and then let them retire with love and reverence into rest and silence.