प्राण व प्राणों द्वारा प्रभु-दर्शन
Word-Meaning: - [१] (मरुतः) = प्राण (क्राणा:) = शरीर में सब कर्मों को [कुर्वाणाः] कर रहे हैं। ये (रुद्राः) = रोगों का विद्रावण करनेवाले हैं (विश्वकृष्टयः) = मनुष्य को पूर्ण बनानेवाले हैं [विश्वः कृष्टिः यैः ] इनकी साधना से ही शरीर, मन व बुद्धि स्वस्थ होते हैं । (दिवः श्येनासः) = ये प्रकाश के द्वारा गति करनेवाले हैं। इनकी साधना से ज्ञान की दीप्ति होती है, उस ज्ञान के प्रकाश में सब क्रियाएँ बड़े ठीक ढंग से होती हैं। इस प्रकार ये प्राण (असुरस्य) = उस प्राणशक्ति का संचार करनेवाले प्रभु के निवास-स्थान बनते हैं । [२] (तेभिः) = उन प्राणों से ही इनकी साधना से ही, (वरुणः) = द्वेष का निवारण करनेवाला, (मित्र:) = सबके साथ स्नेह करनेवाला व [प्रमीतेः क्रयते] रोगों व पापों से ऊपर उठनेवाला, (अर्यमा) = दानशील अथवा [अदीन् यच्छति] शत्रुओं का नियमन करनेवाला (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (चष्टे) = उस प्रभु का दर्शन करता है । [३] यह (देवेभिः) = उत्तम दिव्य व्यवहारवाले (अर्वशेभिः) = इन्द्रियाश्वोंवाले प्राणों से (अर्वशः) = उत्तम इन्द्रियाश्वोंवाला होता है । प्राणायाम से इन्द्रियों के दोष दूर होते हैं। ये इन्द्रियाश्व उत्तम बनते हैं, गतिशील होते हैं और आत्मा के वश में होते हैं [अर् वश ] ।
Connotation: - भावार्थ - प्राणसाधना से हम 'वरुण, मित्र, अर्यमा व इन्द्र' बनकर प्रभु-दर्शन में प्रवृत्त हों ।