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क्रा॒णा रु॒द्रा म॒रुतो॑ वि॒श्वकृ॑ष्टयो दि॒वः श्ये॒नासो॒ असु॑रस्य नी॒ळय॑: । तेभि॑श्चष्टे॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मेन्द्रो॑ दे॒वेभि॑रर्व॒शेभि॒रर्व॑शः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

krāṇā rudrā maruto viśvakṛṣṭayo divaḥ śyenāso asurasya nīḻayaḥ | tebhiś caṣṭe varuṇo mitro aryamendro devebhir arvaśebhir arvaśaḥ ||

पद पाठ

क्रा॒णाः । रु॒द्राः । म॒रुतः॑ । वि॒श्वऽकृ॑ष्टयः । दि॒वः । श्ये॒नासः॑ । असु॑रस्य । नी॒ळयः॑ । तेभिः॑ । च॒ष्टे॒ । वरु॑णः । मि॒त्रः । अ॒र्य॒मा । इन्द्रः॑ । दे॒वेभिः॑ । अ॒र्व॒शेभिः । अर्व॑शः ॥ १०.९२.६

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:92» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:24» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:6


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (असुरस्य) मेघ के (नीळयः) आवास या आधार (क्राणाः) वृष्टि करनेवाले (रुद्राः) शब्द करते हुए (मरुतः) मेघ में रहनेवाले वायु (विश्वकृष्टयः) सब मनुष्यों या खेतियों के निमित्त (दिवः श्येनासः) मेघमण्डल के प्रेरक हैं (तेभिः-देवेभिः) उन देवों (अर्वशेभिः) गति शक्तिवालों के द्वारा (अर्वशः) प्रशस्त गतिमान् (वरुणः) सबका वरनेवाला (मित्रः) सबका प्रेरक (अर्यमा) सबका स्वामी (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (चष्टे) देखता है-जानता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - मेघ के आधारभूत वृष्टि के करनेवाले शब्द करते हुए मेघ में वर्त्तमान वायु हैं, जो सब मनुष्यादि प्राणियों, सब अन्नादि खेतियों की पुष्टि के कारण हैं, मेघमण्डल से प्रेरित होते हैं, उन गतिशील वायुओं के द्वारा प्रशस्त विभु गतिमान् सबको वरनेवाला सबका प्रेरक सबका स्वामी परमात्मा सर्वद्रष्टा है ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राण व प्राणों द्वारा प्रभु-दर्शन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मरुतः) = प्राण (क्राणा:) = शरीर में सब कर्मों को [कुर्वाणाः] कर रहे हैं। ये (रुद्राः) = रोगों का विद्रावण करनेवाले हैं (विश्वकृष्टयः) = मनुष्य को पूर्ण बनानेवाले हैं [विश्वः कृष्टिः यैः ] इनकी साधना से ही शरीर, मन व बुद्धि स्वस्थ होते हैं । (दिवः श्येनासः) = ये प्रकाश के द्वारा गति करनेवाले हैं। इनकी साधना से ज्ञान की दीप्ति होती है, उस ज्ञान के प्रकाश में सब क्रियाएँ बड़े ठीक ढंग से होती हैं। इस प्रकार ये प्राण (असुरस्य) = उस प्राणशक्ति का संचार करनेवाले प्रभु के निवास-स्थान बनते हैं । [२] (तेभिः) = उन प्राणों से ही इनकी साधना से ही, (वरुणः) = द्वेष का निवारण करनेवाला, (मित्र:) = सबके साथ स्नेह करनेवाला व [प्रमीतेः क्रयते] रोगों व पापों से ऊपर उठनेवाला, (अर्यमा) = दानशील अथवा [अदीन् यच्छति] शत्रुओं का नियमन करनेवाला (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (चष्टे) = उस प्रभु का दर्शन करता है । [३] यह (देवेभिः) = उत्तम दिव्य व्यवहारवाले (अर्वशेभिः) = इन्द्रियाश्वोंवाले प्राणों से (अर्वशः) = उत्तम इन्द्रियाश्वोंवाला होता है । प्राणायाम से इन्द्रियों के दोष दूर होते हैं। ये इन्द्रियाश्व उत्तम बनते हैं, गतिशील होते हैं और आत्मा के वश में होते हैं [अर् वश ] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से हम 'वरुण, मित्र, अर्यमा व इन्द्र' बनकर प्रभु-दर्शन में प्रवृत्त हों ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (असुरस्य) मेघस्य “असुरो मेघनाम” [निघ० १।१०३] (नीळयः) आवासा आधारभूता “नीडं गृहनाम” [निघ० ३।४] इकारश्छान्दसोऽकारस्य स्थाने (क्राणाः) वृष्टिं कुर्वाणाः “क्राणाः कुर्वाणाः” [निरु० ४।१९] (रुद्राः) शब्दयन्तः “रुद्रो रौतीति सतः” [निरु० १०।५] (मरुतः) मेघस्थवायवः (विश्वकृष्टयः) सर्वकृष्टिनिमित्ताः-सर्वमनुष्यहितकरा यद्वा सर्वकृषिनिमित्ताः (दिवः श्येनासः) मेघमण्डलस्य प्रेरकाः सन्ति (तेभिः-देवेभिः) तैर्देवैः (अर्वशेभिः) गतिशक्तिमद्भिः “अर्वा-ईरणवान्” [निरु० १०।३०] शः प्रत्ययो मत्वर्थीयः ‘अर्वशो यथा लोमशः’ (अर्वशः) प्रशस्तगतिमान् (वरुणः) सर्वेषां वरयिता (मित्रः) सर्वेषां प्रेरयिता (अर्यमा) स्वामी (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (चष्टे) पश्यति-जानाति ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Active currents of the cosmic energy of the Maruts, dwelling all over the universe, move from the regions of the sun as directed companions of the ocean of vapours, and along with those dynamic currents are seen the dynamic Varuna, Mitra, Aryama and Indra, forces of nature’s catalysis, integration, direction and motive energy.