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बळ॑स्य नी॒था वि प॒णेश्च॑ मन्महे व॒या अ॑स्य॒ प्रहु॑ता आसु॒रत्त॑वे । य॒दा घो॒रासो॑ अमृत॒त्वमाश॒तादिज्जन॑स्य॒ दैव्य॑स्य चर्किरन् ॥

English Transliteration

baḻ asya nīthā vi paṇeś ca manmahe vayā asya prahutā āsur attave | yadā ghorāso amṛtatvam āśatād ij janasya daivyasya carkiran ||

Pad Path

बट् । अ॒स्य॒ । नी॒था । वि । प॒णेः । च॒ । म॒न्म॒हे॒ । व॒याः । अ॒स्य॒ । प्रऽहु॑ताः । आ॒सुः॒ । अत्त॑वे । य॒दा । घो॒रासः॑ । अ॒मृ॒त॒ऽत्वम् । आश॑त । आत् । इत् । जन॑स्य । दैव्य॑स्य । च॒र्कि॒र॒न् ॥ १०.९२.३

Rigveda » Mandal:10» Sukta:92» Mantra:3 | Ashtak:8» Adhyay:4» Varga:23» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:8» Mantra:3


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अस्य पणेः) इस स्तुतियोग्य परमात्मा के (बट् नीथा) सत्य नयन करने-ग्रहण करने-स्वीकार करने योग्य साधन (वि मन्महे) विशेषरूप से हम चाहते हैं। (अस्य प्रहुताः वयाः) इसके प्रकृष्टता से दिये अन्नादि पदार्थ (अत्तवे-आसुः) खाने भोगने को पर्याप्त होवें-हैं (यदा घोरासः) जब ही घोर तपस्वी या जप करनेवाले ध्यानी (अमृतत्वम्-आशत) अमरत्व को प्राप्त करते हैं (आत्-इत्) अनन्तर ही (दैव्यस्य जनस्य) देवों-मुमुक्षुओं के हितकर उत्पन्न करनेवाले परमात्मा के (चर्किरन्) कृपाप्रसाद या आनन्दधाराएँ उपासकों के अन्दर गिरती हैं, बरसती हैं ॥३॥
Connotation: - स्तुतियोग्य परमात्मा के सत्य नियम और साधन अपने जीवन में अपनाने चाहिए, जिससे उसके दिये हुए भोगपदार्थों का उत्तमता से भोग कर सकें। वह तपस्वियों, ध्यानियों, उपासकों के अन्दर अपने कृपाप्रसाद एवं अमृतानन्द को बरसाता है ॥३॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रभु-स्तवन व सात्त्विक अन्न सेवन

Word-Meaning: - [१] (अस्य विपणेः) = इस अतिशयेन स्तुति के योग्य प्रभु के (नीथाः) = प्रणयन (बट्) = सत्य हैं, सो हम इस प्रभु का ही (मन्महे) = हम मनन व चिन्तन करते हैं। प्रभु के स्वरूप का चिन्तन ही वस्तुतः मार्गदर्शन कराता है। हमें प्रभु के अनुरूप ही 'दयालु व न्यायकारी' बनना है। [२] इस ठीक मार्ग पर चलाने के लिए आवश्यक है कि अस्य = इस प्रभु के वयाः = अन्न ही प्रहुताः = यज्ञों में विनियुक्त होने के बाद यज्ञशेष के रूप में अत्तवे आसुः - खाने के लिए हों । सात्त्विक अन्नों का ही हम प्रयोग करें और वह भी यज्ञशेष के रूप में। [३] इस प्रकार 'प्रभु के मनन व प्रभुदत्त अन्नों के सेवन' से (यदा) = जब (घोरासः) = [उग्र: घोर = noble] उत्कृष्ट चरित्रवाले (अमृतत्वम्) = अमृतत्व को (आशत) = प्राप्त करते हैं, जब ये सांसारिक विषयों के पीछे नहीं मरते तो (आत् इत्) = तब शीघ्र ही (दैव्यस्य जनस्य) = उस देव के मार्ग पर चलानेवाले लोगों के गुणों को (चर्किरन्) = [कृ= क्षिप्= प्रेरणे] अपने में प्रेरित करते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु चिन्तन करते हुए प्रभु के अनुरूप बनने का प्रयत्न करें, इसी को मार्ग समझें । सात्त्विक अन्नों को ही यज्ञशेष के रूप में खाएँ । विषयों की आसक्ति से ऊपर उठकर अपने में दिव्य गुणों को प्रेरित करें ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अस्य पणेः) अस्य स्तुत्यस्य परमात्मनः (बट्-नीथा) सत्यानि “बट् सत्यनाम” [निघ० ३।१०] नीथानि नयनानि ग्रहणानि स्वीकरणीयानि साधनानि (वि मन्महे) विशेषेण वयं याचामहे “मन्महे याच्ञाकर्मा” [निघ० ३।१९] (अस्य प्रहुताः-वयाः-अत्तवे-आसुः) अस्य परमात्मनः प्रकृष्टतया दत्ताः खल्वन्नादयः पदार्था अत्तुं भोक्तुं पर्याप्ताः भवेयुः (यदा घोरासः) यदा हि घोराः, घोरतपस्विनः-यद्वा जपशब्दं कुर्वाणाः “घुर शब्दे” [तुदादि०] (अमृतत्वम्-आशत) अमरत्वं प्राप्नुवन्ति (आत्-इत्) अनन्तरमेव (दैव्यस्य-जनस्य चर्किरन्) देवानां हितकरस्य जनयितुः परमात्मनः कृपाप्रसादाः-आनन्दधारा वा उपासकेषु भृशं किरन्ति वर्षन्ति ॥३॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Truly do we love and adore the various gifts of this Agni. May the food, energy and sustenance, all with light divine, blessed gifts, be good for consumption and advancement. Indeed, when relentless devotees come to realise the imperishable joy and freedom of immortality, then are the gifts of this divine Agni truly realised in actuality.