प्रभु-स्तवन व सात्त्विक अन्न सेवन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्य विपणेः) = इस अतिशयेन स्तुति के योग्य प्रभु के (नीथाः) = प्रणयन (बट्) = सत्य हैं, सो हम इस प्रभु का ही (मन्महे) = हम मनन व चिन्तन करते हैं। प्रभु के स्वरूप का चिन्तन ही वस्तुतः मार्गदर्शन कराता है। हमें प्रभु के अनुरूप ही 'दयालु व न्यायकारी' बनना है। [२] इस ठीक मार्ग पर चलाने के लिए आवश्यक है कि अस्य = इस प्रभु के वयाः = अन्न ही प्रहुताः = यज्ञों में विनियुक्त होने के बाद यज्ञशेष के रूप में अत्तवे आसुः - खाने के लिए हों । सात्त्विक अन्नों का ही हम प्रयोग करें और वह भी यज्ञशेष के रूप में। [३] इस प्रकार 'प्रभु के मनन व प्रभुदत्त अन्नों के सेवन' से (यदा) = जब (घोरासः) = [उग्र: घोर = noble] उत्कृष्ट चरित्रवाले (अमृतत्वम्) = अमृतत्व को (आशत) = प्राप्त करते हैं, जब ये सांसारिक विषयों के पीछे नहीं मरते तो (आत् इत्) = तब शीघ्र ही (दैव्यस्य जनस्य) = उस देव के मार्ग पर चलानेवाले लोगों के गुणों को (चर्किरन्) = [कृ= क्षिप्= प्रेरणे] अपने में प्रेरित करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु चिन्तन करते हुए प्रभु के अनुरूप बनने का प्रयत्न करें, इसी को मार्ग समझें । सात्त्विक अन्नों को ही यज्ञशेष के रूप में खाएँ । विषयों की आसक्ति से ऊपर उठकर अपने में दिव्य गुणों को प्रेरित करें ।