Word-Meaning: - [१] (ते) = वे (हि) = निश्चय से (भूरिरेतसा) = बहुत शक्तिवाले (द्यावापृथिवी) = द्युलोक और पृथिवीलोक (प्र अहिरे) = प्रकर्षेण पूजा के योग्य हैं। 'रेतस्' उदक को भी कहते हैं, तब 'भूरिरेतसा' का अर्थ है ‘पालक जलवाले' [भूरि- भृ-धारण-पोषणयोः] । पृथ्वी का जल सूर्य किरणों से वाष्पीभूत होकर ऊपर जाता है और मेघरूप में होकर वृष्टि के द्वारा अन्नोत्पादन का हेतु होता है और इस प्रकार प्रजाओं का पालन करता है। इसी कारण 'द्यावापृथिवी'-पिता व माता कहलाते हैं । इनका आदर करना यही है कि इसका उपयोग ठीक प्रकार से किया जाये। [२] (नराशंसः) = [ नरश्चासौ आशंसः च] आगे ले चलनेवाला और ज्ञान को देनेवाला ज्ञानी ब्राह्मण, जो (चतुरंग:) = चारों अंगोंवाला है, अर्थात् जिसने ऋग्वेद से प्रकृति विज्ञान को, यजुर्वेद से जीव कर्त्तव्य ज्ञान को, साम से आत्मोपासना को तथा अथर्व से युद्ध विज्ञान व रोगविज्ञान को प्राप्त किया है, वह अग्नितुल्य [नराशंस] ब्राह्मण आदर के योग्य है। [३] ब्राह्मणों के बाद राष्ट्र में क्षत्रिय का स्थान है । (यमः) = राष्ट्र का नियमन करनेवाला और इस प्रकार (अदितिः) = [=अविद्यमाना दितिर्यस्यात्] राष्ट्र का खण्डन व नाश न होने देनेवाला यह क्षत्रिय राजा भी आदर के योग्य हैं । [४] (देवः) = राष्ट्र में सब व्यवहारों का साधक [दिव्=व्यवहार] (त्वष्टा) = विविध उपयोगी वस्तुओं का निर्माता [ त्वक्ष्] । व्यवहार व निर्माण के द्वारा अर्जित (द्रविणोदा:) = धनों का दान करनेवाला, दान के कारण (ऋभुक्षणः) = महान् [महाजन] वैश्य भी आदर के योग्य है । [५] इन वैश्यों के बाद (रोदसी मरुतः) = इन द्यावापृथिवी के प्राणभूत ये श्रमिक भी आदर के ही योग्य हैं। इन शूद्रों से ही ब्राह्मण क्षत्रिय व वैश्य अपने अपने कर्मों को सम्यक्तया कर पाते हैं, यह श्रमिक वर्ग उनके कार्यों में सहायक होता है। [६] अन्त में (विष्णु) = वह व्यापक प्रभु, जिसकी शक्ति ही चराचर में कार्य कर रही है, पूजा के योग्य है । प्रभु ही द्यावापृथिवी को, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व श्रमिक वर्ग को शक्ति के देनेवाले हैं ।
Connotation: - भावार्थ - देव, त्वष्टा, द्रविणोदा, ऋभुक्षण, मरुत, विष्णु हमें शक्ति के देनेवाले हैं ।