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ते हि द्यावा॑पृथि॒वी भूरि॑रेतसा॒ नरा॒शंस॒श्चतु॑रङ्गो य॒मोऽदि॑तिः । दे॒वस्त्वष्टा॑ द्रविणो॒दा ऋ॑भु॒क्षण॒: प्र रो॑द॒सी म॒रुतो॒ विष्णु॑रर्हिरे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

te hi dyāvāpṛthivī bhūriretasā narāśaṁsaś caturaṅgo yamo ditiḥ | devas tvaṣṭā draviṇodā ṛbhukṣaṇaḥ pra rodasī maruto viṣṇur arhire ||

पद पाठ

ते । हि । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । भूरि॑ऽरेतसा । नरा॒शंसः॑ । चतुः॑ऽअङ्गः । य॒मः । अदि॑तिः । दे॒वः । त्वष्टा॑ । द्र॒वि॒णः॒ऽदाः । ऋ॒भु॒क्षणः॑ । प्र । रो॒द॒सी इति॑ । म॒रुतः॑ । विष्णुः॑ । अ॒र्हि॒रे॒ ॥ १०.९२.११

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:92» मन्त्र:11 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:25» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:11


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते हि भूरिरेतसा द्यावापृथिवी) वे ही बहुत सन्तान बीज शक्तिवाले माता-पिता (नराशंसः) मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय (चतुरङ्गः) चारों वेदों को जाननेवाला चतुर्वेदवित् (यमः) संयमी जितेन्द्रिय जन (अदितिः) अखण्डित बुद्धिवाला (त्वष्टा देवः) शिल्पी विद्वान् (द्रविणोदाः) धनदाता-दानी (ऋभुक्षणः) महान् सम्राट् (रोदसी) कुल या देश के शोधन करनेवाले-बाधकों का निवारण करनेवाले पुरोहित और रक्षक कर्मचारी या सैनिक प्रहरी (मरुतः) ऋत्विग्जन (विष्णुः) व्यापक परमात्मा, ये सब (प्र-अर्हिरे) पूजे जावें ॥११॥
भावार्थभाषाः - कुल में या देश में वीर्यशक्तिसम्पन्न स्त्री-पुरुष, प्रशंसनीय चारों वेदों का जाननेवाला जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी, प्रखर बुद्धिमान्, शिल्पी कलाकार, दानीजन, दुःखबाधानिवारक, समय-समय श्रेष्ठ कर्म करानेवाले तथा सर्वव्यापक परमात्मा पूजा के योग्य हैं ॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

चराचर का व प्रभु का आदर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ते) = वे (हि) = निश्चय से (भूरिरेतसा) = बहुत शक्तिवाले (द्यावापृथिवी) = द्युलोक और पृथिवीलोक (प्र अहिरे) = प्रकर्षेण पूजा के योग्य हैं। 'रेतस्' उदक को भी कहते हैं, तब 'भूरिरेतसा' का अर्थ है ‘पालक जलवाले' [भूरि- भृ-धारण-पोषणयोः] । पृथ्वी का जल सूर्य किरणों से वाष्पीभूत होकर ऊपर जाता है और मेघरूप में होकर वृष्टि के द्वारा अन्नोत्पादन का हेतु होता है और इस प्रकार प्रजाओं का पालन करता है। इसी कारण 'द्यावापृथिवी'-पिता व माता कहलाते हैं । इनका आदर करना यही है कि इसका उपयोग ठीक प्रकार से किया जाये। [२] (नराशंसः) = [ नरश्चासौ आशंसः च] आगे ले चलनेवाला और ज्ञान को देनेवाला ज्ञानी ब्राह्मण, जो (चतुरंग:) = चारों अंगोंवाला है, अर्थात् जिसने ऋग्वेद से प्रकृति विज्ञान को, यजुर्वेद से जीव कर्त्तव्य ज्ञान को, साम से आत्मोपासना को तथा अथर्व से युद्ध विज्ञान व रोगविज्ञान को प्राप्त किया है, वह अग्नितुल्य [नराशंस] ब्राह्मण आदर के योग्य है। [३] ब्राह्मणों के बाद राष्ट्र में क्षत्रिय का स्थान है । (यमः) = राष्ट्र का नियमन करनेवाला और इस प्रकार (अदितिः) = [=अविद्यमाना दितिर्यस्यात्] राष्ट्र का खण्डन व नाश न होने देनेवाला यह क्षत्रिय राजा भी आदर के योग्य हैं । [४] (देवः) = राष्ट्र में सब व्यवहारों का साधक [दिव्=व्यवहार] (त्वष्टा) = विविध उपयोगी वस्तुओं का निर्माता [ त्वक्ष्] । व्यवहार व निर्माण के द्वारा अर्जित (द्रविणोदा:) = धनों का दान करनेवाला, दान के कारण (ऋभुक्षणः) = महान् [महाजन] वैश्य भी आदर के योग्य है । [५] इन वैश्यों के बाद (रोदसी मरुतः) = इन द्यावापृथिवी के प्राणभूत ये श्रमिक भी आदर के ही योग्य हैं। इन शूद्रों से ही ब्राह्मण क्षत्रिय व वैश्य अपने अपने कर्मों को सम्यक्तया कर पाते हैं, यह श्रमिक वर्ग उनके कार्यों में सहायक होता है। [६] अन्त में (विष्णु) = वह व्यापक प्रभु, जिसकी शक्ति ही चराचर में कार्य कर रही है, पूजा के योग्य है । प्रभु ही द्यावापृथिवी को, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व श्रमिक वर्ग को शक्ति के देनेवाले हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - देव, त्वष्टा, द्रविणोदा, ऋभुक्षण, मरुत, विष्णु हमें शक्ति के देनेवाले हैं ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते हि भूरिरेतसा द्यावापृथिवी) तौ हि बहुसन्तानबीजवन्तौ मातापितरौ “द्यौर्मे पिता……माता पृथिवी महीयम्……”  [ऋ० १।१६४।३३] (नराशंसः चतुरङ्गः) नरैः प्रशंसनीयः-चतुरो वेदानङ्गति जानाति चतुर्वेदवित् “अङ्गः-अङ्गति जानाति” [यजु० १०।३२ दयानन्दः] (यमः) संयमी जितेन्द्रियो जनः (अदितिः) अखण्डितप्रज्ञः “अदितिः अखण्डितबुद्धिः” [यजु० ३३।१६ दयानन्दः] (त्वष्टा देवः) शिल्पी विद्वान् (द्रविणोदाः) धनदाता-दानी (ऋभुक्षणः) महान् सम्राट् “ऋभुक्षा महन्नाम” [निघ० ३।३] ऋभुक्षा-उरुक्षयणाः-“ऋभूणां राजेति वा” [निरु० ९।१] (रोदसी) कुलस्य देशस्य वा रोधकर्तारौ बाधकानां निवारयितारौ “रोदसी रोधसी” [निरु० ६।१] (मरुतः) ऋत्विजः “मरुतः-ऋत्विङ्नाम” [निघ० ३।१८] (विष्णुः) व्यापकः परमात्मा, एते सर्वे (प्र-अर्हिरे) पूज्येरन् ॥११॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - These for sure are the divinities which contribute to the evolution and flow of life : the solar region and the earth both replete with life and fertility, the middle region which overflows with electric energy, air, vapour, and elements of nourishment, evolutionary law in its course, imperishable mother nature, divine Tvashta which is the formative power immensely generous and keen to structure the forms, pranic energy, wind energy, and Vishnu, divine power of sustenance. These are powers worthy of our gratitude, reverence and worship.