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सू॒क्त॒वा॒कं प्र॑थ॒ममादिद॒ग्निमादिद्ध॒विर॑जनयन्त दे॒वाः । स ए॑षां य॒ज्ञो अ॑भवत्तनू॒पास्तं द्यौर्वे॑द॒ तं पृ॑थि॒वी तमाप॑: ॥

English Transliteration

sūktavākam prathamam ād id agnim ād id dhavir ajanayanta devāḥ | sa eṣāṁ yajño abhavat tanūpās taṁ dyaur veda tam pṛthivī tam āpaḥ ||

Pad Path

सू॒क्त॒ऽवा॒कम् । प्र॒थ॒मम् । आत् । इत् । अ॒ग्निम् । आत् । इत् । ह॒विः । अ॒ज॒न॒य॒न्त॒ । दे॒वाः । सः । ए॒षा॒म् । य॒ज्ञः । अ॒भ॒व॒त् । त॒नू॒ऽपाः । तम् । द्यौः । वे॒द॒ । तम् । पृ॒थि॒वी । तम् । आपः॑ ॥ १०.८८.८

Rigveda » Mandal:10» Sukta:88» Mantra:8 | Ashtak:8» Adhyay:4» Varga:11» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:7» Mantra:8


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (देवाः) विद्वान् जन  (प्रथमम्) प्रथम (सूक्तवाकम्) मन्त्रसंस्थान को बोलते हैं (आत्-इत्) अनन्तर ही अग्नि को ज्वलित करते हैं (आत्-इत्) अनन्तर ही (हविः-अजनयन्त) हव्य वस्तु को सम्पादन करते हैं या होमते हैं ॥८॥
Connotation: - विद्वानों को प्रथम मन्त्रसमूह बोलना चाहिए। पुनः अग्न्याधान करना, फिर होमने योग्य वस्तु अग्नि में छोड़ते हैं ॥८॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'यज्ञ' शरीर का रक्षक है

Word-Meaning: - [१] (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (प्रथमम्) = सबसे पहले (सूक्तवाकम्) = मधुर शब्दों के प्रयोग को अजनयन्त अपने में प्रकट करते हैं, सदा मधुर शब्दों को ही बोलते हैं। [२] (आत् इत्) = अब इसके बाद (अग्निं अजनयन्त) = अग्निहोत्र के लिए अग्नि को समिद्ध करते हैं । (आत् इत्) = और अब यज्ञ करके यज्ञशेष के रूप में (हविः) = दानपूर्वक अदन को (अजनयन्त) = अपने में विकसित करते हैं। इस प्रकार इस हवि के सेवन से ये प्रभु का उपासन करते हैं 'कस्मै देवाय हविषा विधेम ' । [३] (एषाम्) = इन देववृत्तिवाले पुरुषों का (स यज्ञः) = वह यज्ञ (तनूपाः अभवत्) = इनके शरीरों का रक्षण करनेवाला होता है। यज्ञ से इनके शरीर नीरोग बने रहते हैं। यज्ञ से वायुशुद्धि होकर नीरोगता प्राप्त होती ही है और यज्ञशेष का सेवन स्वयं अपने में अमृत होता है । यज्ञशेष के सेवन की वृत्ति से मनुष्य कभी अतिमुक्त नहीं होता। [४] (तम्) = उस यज्ञ को इन्हें (द्यौः) = द्युलोक वेद प्राप्त कराता है (तम्) = उस यज्ञ को (पृथिवी) = पृथिवी प्राप्त कराती है और (तम्) = उस यज्ञ को (आपः) = अन्तरिक्षलोक प्राप्त कराता है । अध्यात्म में (द्यौः) = मस्तिष्क है, पृथिवी शरीर है तथा (अन्तरिक्ष) = हृदय व मन है । एवं इनका मस्तिष्क, इनका शरीर व इनका हृदय इन्हें इस यज्ञ में रुचिवाला करता है। ये ज्ञान, शक्ति व संकल्प से यज्ञ में प्रवृत्त हो जाते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - मधुर शब्दों के प्रयोग, यज्ञ के करने व हवि के सेवन की वृत्ति से देव प्रभु का दर्शन करते हैं। ये ज्ञान, शक्ति व संकल्प पूर्वक यज्ञों को करते हैं और यह यज्ञ इनको नीरोग बनाता है ।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (देवाः प्रथमं सूक्तवाकम्) विद्वांसः प्रथमं मन्त्रसंस्थानमाचरन्ति (आत्-इत्) अनन्तरम् (अग्निम्) अग्निं ज्वालयन्ति-आदधति वा (आत्-इत्) अनन्तरमेव (हविः-अजनयन्त) हव्यं सम्पादयन्ति-जुह्वति (एषां सः-यज्ञः) एतेषां स यज्ञः (तनूपाः-अभवत्) शरीररक्षको भवति (तं द्यौः-वेद) तं यज्ञं द्यौर्द्युलोकः प्राप्नोति (तं पृथिवी) तं यज्ञं पृथिवी च प्राप्नोति (तम्-आपः) तं यज्ञमन्तरिक्षं च प्राप्नोति ॥८॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The devas, noble yajakas, first chant the divine Word, then they light the fire and then they prepare and offer the havi. That Agni is the adorable lord of them all, guardian and promoter of health and age. That the heaven receives, that the earth receives, and that the waters receive, and that all of them realise, the pervasive power and energiser.