पदार्थान्वयभाषाः - [१] (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (प्रथमम्) = सबसे पहले (सूक्तवाकम्) = मधुर शब्दों के प्रयोग को अजनयन्त अपने में प्रकट करते हैं, सदा मधुर शब्दों को ही बोलते हैं। [२] (आत् इत्) = अब इसके बाद (अग्निं अजनयन्त) = अग्निहोत्र के लिए अग्नि को समिद्ध करते हैं । (आत् इत्) = और अब यज्ञ करके यज्ञशेष के रूप में (हविः) = दानपूर्वक अदन को (अजनयन्त) = अपने में विकसित करते हैं। इस प्रकार इस हवि के सेवन से ये प्रभु का उपासन करते हैं 'कस्मै देवाय हविषा विधेम ' । [३] (एषाम्) = इन देववृत्तिवाले पुरुषों का (स यज्ञः) = वह यज्ञ (तनूपाः अभवत्) = इनके शरीरों का रक्षण करनेवाला होता है। यज्ञ से इनके शरीर नीरोग बने रहते हैं। यज्ञ से वायुशुद्धि होकर नीरोगता प्राप्त होती ही है और यज्ञशेष का सेवन स्वयं अपने में अमृत होता है । यज्ञशेष के सेवन की वृत्ति से मनुष्य कभी अतिमुक्त नहीं होता। [४] (तम्) = उस यज्ञ को इन्हें (द्यौः) = द्युलोक वेद प्राप्त कराता है (तम्) = उस यज्ञ को (पृथिवी) = पृथिवी प्राप्त कराती है और (तम्) = उस यज्ञ को (आपः) = अन्तरिक्षलोक प्राप्त कराता है । अध्यात्म में (द्यौः) = मस्तिष्क है, पृथिवी शरीर है तथा (अन्तरिक्ष) = हृदय व मन है । एवं इनका मस्तिष्क, इनका शरीर व इनका हृदय इन्हें इस यज्ञ में रुचिवाला करता है। ये ज्ञान, शक्ति व संकल्प से यज्ञ में प्रवृत्त हो जाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - मधुर शब्दों के प्रयोग, यज्ञ के करने व हवि के सेवन की वृत्ति से देव प्रभु का दर्शन करते हैं। ये ज्ञान, शक्ति व संकल्प पूर्वक यज्ञों को करते हैं और यह यज्ञ इनको नीरोग बनाता है ।