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दृ॒शेन्यो॒ यो म॑हि॒ना समि॒द्धोऽरो॑चत दि॒वियो॑निर्वि॒भावा॑ । तस्मि॑न्न॒ग्नौ सू॑क्तवा॒केन॑ दे॒वा ह॒विर्विश्व॒ आजु॑हवुस्तनू॒पाः ॥

English Transliteration

dṛśenyo yo mahinā samiddho rocata diviyonir vibhāvā | tasminn agnau sūktavākena devā havir viśva ājuhavus tanūpāḥ ||

Pad Path

दृ॒शेन्यः॑ । यः । म॒हि॒ना । स॒म्ऽइ॒द्धः । अरो॑चत । दि॒विऽयो॑निः । वि॒भाऽवा॑ । तस्मि॑न् । अ॒ग्नौ । सू॒क्त॒ऽवा॒केन॑ । दे॒वाः । ह॒विः । विश्वे॑ । आ । अ॒जु॒ह॒वुः॒ । त॒नू॒ऽपाः ॥ १०.८८.७

Rigveda » Mandal:10» Sukta:88» Mantra:7 | Ashtak:8» Adhyay:4» Varga:11» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:7» Mantra:7


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (दिवियोनिः) आकाश में आश्रय सूर्य है जिसका, ऐसा अग्नि (समिद्धः) प्रज्ज्वलित हुआ (यः-महिम्ना दृशेन्यः) जो अपने महत्त्व से दर्शनीय है (विभावा-अरोचत) प्रकट दीप्तिवाला प्रकाशमान हो जाता है (तस्मिन्-अग्नौ) उस यज्ञाग्नि में (तनूपाः-विश्वेदेवाः) शरीररक्षक सब विद्वान् (सूक्तवाकेन) वचनसंस्था-मन्त्रक्रमिकता से (हविः-आजुहवुः) घृतादिक भली-भाँति होमते हैं ॥७॥
Connotation: - पृथिवीस्थ अग्नि सदा आकाश के सूर्य को उन्मुख हो प्रज्ज्वलित होती है, उसे वेदि में घृतादि होम्य वस्तु देनी चाहिए अपने शरीर की रक्षा करने के लिये ॥७॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मधुर शब्द तथा यज्ञशेष का सेवन

Word-Meaning: - [१] वे प्रभु (दृशेन्य:) = दर्शनीय हैं, सुन्दर ही सुन्दर होने से दर्शन के योग्य तो हैं ही, इसलिए भी वे दर्शन के योग्य हैं कि उनके दर्शन होने पर ही यह 'जन्म-मरण-चक्र' समाप्त होता है । वे प्रभु दर्शनीय हैं (यः) = जो (महिना समिद्धः) = अपनी महिमा से दीप्त हैं, उस प्रभु की महिमा प्रत्येक पदार्थ में प्रकट हो रही है । वे (दिवियोनिः) = सदा ज्ञान में निवास करनेवाले (विभावा) = विशिष्ट दीप्तिवाले प्रभु अरोचत सदा देदीप्यमान हैं, सहस्रों सूर्यों की दीप्ति भी प्रभु की दीप्ति को उपमित नहीं कर सकती। [२] (तस्मिन् अग्नौ) = उस प्रभु की प्राप्ति के निमित्त (विश्वे) = सब (तनूपाः) = अपने शरीरों का रक्षण करनेवाले (देवाः) = देववृत्ति के पुरुष (सूक्तवाकेन) = मधुर शब्दों के उच्चारण के साथ (हविः) = यज्ञशेष को (आजुहवुः) = अपने में आहुत करते हैं । अर्थात् प्रभु की प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि - [क] शरीर को स्वस्थ रखा जाए, [ख] वृत्ति को दिव्य बनाया जाए, [ग] मधुर ही शब्दों का प्रयोग हो और (घ) हम सदा त्यागपूर्वक अदन की वृत्तिवाले बनें। इस हवि के सेवन से ही तो प्रभु का सच्चा उपासन होता है ।
Connotation: - भावार्थ - मानव जीवन का उद्देश्य यही है कि प्रभु का दर्शन करके मोक्ष प्राप्त किया जाए। मोक्ष प्राप्ति के लिये साधन ये हैं- [क] शरीर को नीरोग रखना, [ख] दैवी सम्पत्ति का अर्जन, [ग] मधुर शब्दों का ही उच्चारण और [घ] हवि का स्वीकार = त्यागपूर्वक अदन । ऋ
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (दिवियोनिः) आकाशे योनिराश्रयः सूर्यो यस्य तथा भूतोऽग्निः (समिद्धः) प्रज्वलितः (यः-महिम्ना दृशेन्यः) यः स्वमहत्त्वेन दर्शनीयो भवति (विभावा-अरोचत) विभावान् प्रकाशते (तस्मिन्-अग्नौ) तस्मिन् यज्ञाग्नौ (तनूपाः-विश्वेदेवाः) शरीररक्षकाः सर्वे विद्वांसः (सूक्तवाकेन) वचनसंस्थया “संस्थाः सूक्तवाक्” [श० ११।२।७।२८] मन्त्रक्रमेण (हविः-आजुहवुः) घृतादिकं समन्तात् प्रयच्छन्ति ॥७॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Wondrous in form, Agni, who, refulgent with its own grandeur, shines in heaven as the light most gracious is the divinity into whom, in sacred fire form, all devas, divinities of nature and humanity, guardians of our health and body, offer yajnic oblations of havi with the chant of Vedic mantras.