मधुर शब्द तथा यज्ञशेष का सेवन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] वे प्रभु (दृशेन्य:) = दर्शनीय हैं, सुन्दर ही सुन्दर होने से दर्शन के योग्य तो हैं ही, इसलिए भी वे दर्शन के योग्य हैं कि उनके दर्शन होने पर ही यह 'जन्म-मरण-चक्र' समाप्त होता है । वे प्रभु दर्शनीय हैं (यः) = जो (महिना समिद्धः) = अपनी महिमा से दीप्त हैं, उस प्रभु की महिमा प्रत्येक पदार्थ में प्रकट हो रही है । वे (दिवियोनिः) = सदा ज्ञान में निवास करनेवाले (विभावा) = विशिष्ट दीप्तिवाले प्रभु अरोचत सदा देदीप्यमान हैं, सहस्रों सूर्यों की दीप्ति भी प्रभु की दीप्ति को उपमित नहीं कर सकती। [२] (तस्मिन् अग्नौ) = उस प्रभु की प्राप्ति के निमित्त (विश्वे) = सब (तनूपाः) = अपने शरीरों का रक्षण करनेवाले (देवाः) = देववृत्ति के पुरुष (सूक्तवाकेन) = मधुर शब्दों के उच्चारण के साथ (हविः) = यज्ञशेष को (आजुहवुः) = अपने में आहुत करते हैं । अर्थात् प्रभु की प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि - [क] शरीर को स्वस्थ रखा जाए, [ख] वृत्ति को दिव्य बनाया जाए, [ग] मधुर ही शब्दों का प्रयोग हो और (घ) हम सदा त्यागपूर्वक अदन की वृत्तिवाले बनें। इस हवि के सेवन से ही तो प्रभु का सच्चा उपासन होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - मानव जीवन का उद्देश्य यही है कि प्रभु का दर्शन करके मोक्ष प्राप्त किया जाए। मोक्ष प्राप्ति के लिये साधन ये हैं- [क] शरीर को नीरोग रखना, [ख] दैवी सम्पत्ति का अर्जन, [ग] मधुर शब्दों का ही उच्चारण और [घ] हवि का स्वीकार = त्यागपूर्वक अदन । ऋ