शीर्षतो जातं, मनसा विमृष्टम्
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र में वर्णित 'पितरं मातरं च' = द्युलोक व पृथ्वीलोक (द्वे) = दोनों (समीची) = [सं अञ्च्] मिलकर उत्तम गतिवाले हैं। ये दोनों लोक एक दूसरे की पूर्ति करते हैं । पृथ्वीलोक का पानी वाष्पीभूत होकर द्युलोक को भरता है और द्युलोक से वृष्टि होकर पृथ्वीलोक का पूरण होता है । इस प्रकार ये दोनों सम्यक् उत्तम गतिवाले होते हुए (बिभृतः) = उस प्रभु को धारण करते हैं । जो प्रभु (चरन्तम्) = निरन्तर क्रियाशील हैं, (शीर्षतः जातम्) = मस्तिष्क से जिनका प्रादुर्भाव होता है, सूक्ष्म बुद्धि से ही तो प्रभु का दर्शन होता है ' बुद्धि' युक्ति के द्वारा इस संसार रूप कार्य के कर्त्ता के रूप में प्रभु को देखती है। वे प्रभु (मनसा विमृष्टम्) = मन से विमृष्ट होते हैं 'मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु' । इस द्युलोक व पृथ्वीलोक के अन्तर्गत एक-एक वस्तु में उस प्रभु की महिमा दृष्टिगोचर होती है । [२] (स) = वे प्रभु (विश्वा भुवनानि) = सब लोगों के (प्रत्यड्) = [imher imterior] अन्दर तस्थौ स्थित हैं । पृथ्वी आदि सब लोकों के अन्दर भी वे उनकी गतियों का नियमन करते हुए स्थित हैं। [३] सब प्राणियों के हृदय में स्थित हुए हुए वे प्रभु (अप्रयुच्छन्) = कभी भी प्रमाद नहीं करते। हृदयस्थरूपेण वे प्रभु हमें सदा प्रेरणा देते रहते हैं । (तरणिः) = वे ही हमें वासनाओं से तरा हैं, प्रभु से शक्ति को प्राप्त करके ही वासनाओं को जीत पाते हैं । भ्(राजमानः) = वे प्रभु दीप्त हैं, ज्ञान से दीप्त वे प्रभु अपने उपासकों के लिये भी इस दीप्ति को प्राप्त कराते हैं।
Connotation: - भावार्थ - द्युलोक व पृथ्वीलोक में सर्वत्र प्रभु की महिमा दृष्टिगोचर होती है । बुद्धि से प्रभु का दर्शन होता है, मन से ही प्रभु का विमर्श होता है सब प्राणियों के अन्दर स्थित हुए-हुए वे प्रभु सभी का नियमन कर रहे हैं ।