वांछित मन्त्र चुनें

द्वे स॑मी॒ची बि॑भृत॒श्चर॑न्तं शीर्ष॒तो जा॒तं मन॑सा॒ विमृ॑ष्टम् । स प्र॒त्यङ्विश्वा॒ भुव॑नानि तस्था॒वप्र॑युच्छन्त॒रणि॒र्भ्राज॑मानः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dve samīcī bibhṛtaś carantaṁ śīrṣato jātam manasā vimṛṣṭam | sa pratyaṅ viśvā bhuvanāni tasthāv aprayucchan taraṇir bhrājamānaḥ ||

पद पाठ

द्वे इति॑ । स॒मी॒ची इति॑ सम्ऽई॒ची । बि॒भृ॒तः॒ । चर॑न्तम् । शी॒र्ष॒तः । जा॒तम् । मन॑सा । विऽमृ॑ष्टम् । सः । प्र॒त्यङ् । विश्वा॑ । भुव॑नानि । त॒स्थौ॒ । अप्र॑ऽयुच्छन् । त॒रणिः॑ । भ्राज॑मानः ॥ १०.८८.१६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:88» मन्त्र:16 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:13» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:16


372 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मनसा विमृष्टम्) मन में विमर्शनीय-विचारणीय (जातम्) जनक (चरन्तम्) सर्वत्र विचरण करते हुए विभुगति करते हुए परमात्मा को (द्वे समीची) दो साम्मुख्य से वर्तमान द्युलोक पृथिवीलोक (शीर्षतः-बिभ्रतः) शिरोरूप से धारण करते हैं (सः) वह (तरणिः) दुःख से तारक (भ्राजमानः) प्रकाशमान (विश्वा भुवनानि) सारे भूतों के प्रति (अप्रयुच्छन्) प्रमाद न करता हुआ-निरन्तर (प्रत्यङ् तस्थौ) अन्दर रहता है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा जो इस द्यावापृथिवीमय जगत् का शासन करता है, सबका उत्पन्नकर्ता सब में व्यापक निरन्तर रहनेवाला दुःख से तारनेवाला ज्ञानदाता है ॥१६॥
372 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शीर्षतो जातं, मनसा विमृष्टम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में वर्णित 'पितरं मातरं च' = द्युलोक व पृथ्वीलोक (द्वे) = दोनों (समीची) = [सं अञ्च्] मिलकर उत्तम गतिवाले हैं। ये दोनों लोक एक दूसरे की पूर्ति करते हैं । पृथ्वीलोक का पानी वाष्पीभूत होकर द्युलोक को भरता है और द्युलोक से वृष्टि होकर पृथ्वीलोक का पूरण होता है । इस प्रकार ये दोनों सम्यक् उत्तम गतिवाले होते हुए (बिभृतः) = उस प्रभु को धारण करते हैं । जो प्रभु (चरन्तम्) = निरन्तर क्रियाशील हैं, (शीर्षतः जातम्) = मस्तिष्क से जिनका प्रादुर्भाव होता है, सूक्ष्म बुद्धि से ही तो प्रभु का दर्शन होता है ' बुद्धि' युक्ति के द्वारा इस संसार रूप कार्य के कर्त्ता के रूप में प्रभु को देखती है। वे प्रभु (मनसा विमृष्टम्) = मन से विमृष्ट होते हैं 'मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु' । इस द्युलोक व पृथ्वीलोक के अन्तर्गत एक-एक वस्तु में उस प्रभु की महिमा दृष्टिगोचर होती है । [२] (स) = वे प्रभु (विश्वा भुवनानि) = सब लोगों के (प्रत्यड्) = [imher imterior] अन्दर तस्थौ स्थित हैं । पृथ्वी आदि सब लोकों के अन्दर भी वे उनकी गतियों का नियमन करते हुए स्थित हैं। [३] सब प्राणियों के हृदय में स्थित हुए हुए वे प्रभु (अप्रयुच्छन्) = कभी भी प्रमाद नहीं करते। हृदयस्थरूपेण वे प्रभु हमें सदा प्रेरणा देते रहते हैं । (तरणिः) = वे ही हमें वासनाओं से तरा हैं, प्रभु से शक्ति को प्राप्त करके ही वासनाओं को जीत पाते हैं । भ्(राजमानः) = वे प्रभु दीप्त हैं, ज्ञान से दीप्त वे प्रभु अपने उपासकों के लिये भी इस दीप्ति को प्राप्त कराते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - द्युलोक व पृथ्वीलोक में सर्वत्र प्रभु की महिमा दृष्टिगोचर होती है । बुद्धि से प्रभु का दर्शन होता है, मन से ही प्रभु का विमर्श होता है सब प्राणियों के अन्दर स्थित हुए-हुए वे प्रभु सभी का नियमन कर रहे हैं ।
372 बार पढ़ा गया

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मनसा विमृष्टम्) मनसा विमर्शनीयं विचारणीयं मननीयम् “मृश आमर्शने” [तुदा०] ‘औणादिकः क्तः प्रत्ययः’ (जातम्) जनकं जगत्कर्तारं परमात्मानं (चरन्तम्) सर्वत्र विचरन्तं विभुगतिं कुर्वाणम् (द्वे समीची शीर्षतः-बिभ्रतः) उभे सङ्गम्यमाने द्यावापृथिव्यौ शिरोरूपतो धारयति (सः) परमात्मा (तरणिः-भ्राजमानः) दुःखात् तारकः प्रकाशमानः (विश्वा भुवनानि) सर्वाणि भूतानि (अप्रयुच्छन्) अप्रमाद्यन् (प्रत्यङ् तस्थौ) सर्वान्तरे तिष्ठति ॥१६॥
372 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Two, earth and heaven, together bear Agni born on top, vibrant and radiating from the highest heaven, and that abides immanent and pervasive all over the worlds of existence, unremissive, radiant and divinely self-refulgent.