पति ने घर में ही नहीं बैठे रहना
Word-Meaning: - [१] एक युवक जिसका कि (तनूः) = शरीर (रुशती) = देदीप्यमान होता है, वह (यत्) = यदि (पति:) = गृहस्थ में प्रवेश करने पर, पति बनने पर (वध्वः वाससा) -= वधू के वस्त्रों से (स्वं अंगम्) = अपने अङ्गों को अभिधित्सते-आच्छादित करना चाहता है, अर्थात् पत्नी के वस्त्र पहनकर घर पर ही बैठा रहता है । पत्नी के साथ गपशप ही मारता रहता है तो उसका शरीर (अमुया पापया) = उस पापवृत्ति से (अश्रीरा भवति) = बिना श्री के हो जाता है, शोभाशून्य हो जाता है। [२] वधू के वस्त्रों को पहनकर घर में ही बैठे रहने का भाव प्रेमासक्त होकर अकर्मण्य बन जाने से है । विवाहित होने पर भी एक युवक हृदय-प्रधान होकर अपने कर्त्तव्यों को उपेक्षित न कर दे । पत्नी के प्रति आसक्ति उसे कर्त्तव्य विमुख न बना दे। ऐसा होने पर भोग-प्रधान होकर नष्ट - श्रीवाला हो जाता है ।
Connotation: - भावार्थ- नव विवाहित युवक को चाहिये कि भोग-प्रधान जीवनवाला न बन जाये । हर समय घर में ही न बैठा रहे ।