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अ॒श्री॒रा त॒नूर्भ॑वति॒ रुश॑ती पा॒पया॑मु॒या । पति॒र्यद्व॒ध्वो॒३॒॑ वास॑सा॒ स्वमङ्ग॑मभि॒धित्स॑ते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aśrīrā tanūr bhavati ruśatī pāpayāmuyā | patir yad vadhvo vāsasā svam aṅgam abhidhitsate ||

पद पाठ

अ॒श्री॒रा । त॒नूः । भ॒व॒ति॒ । रुश॑ती । पा॒पया॑ । अ॒मु॒या । पतिः॑ । यत् । व॒ध्वः॑ । वास॑सा । स्वम् । अङ्ग॑म् । अ॒भि॒ऽधित्स॑ते ॥ १०.८५.३०

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:85» मन्त्र:30 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:25» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:30


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अमुया पापया) उस रजस्वलापन अशुद्धि से (अश्रीरा) अश्लील (रुशती तनूः-भवति) पति की देह पीड़ा देनेवाली हो जाती है (यत् पतिः) जब पति (वध्वः-वाससा) वधू-भार्या के वस्त्र से (स्वम्-अङ्गम्-अभिधित्सते) अपने शरीर को लगाना छूना चाहता है ॥३०॥
भावार्थभाषाः - रजस्वला का स्पर्श पति को नहीं करना चाहिए, इससे उसकी देह दुःखदायक रोगी बन जाती है ॥३०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पति ने घर में ही नहीं बैठे रहना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] एक युवक जिसका कि (तनूः) = शरीर (रुशती) = देदीप्यमान होता है, वह (यत्) = यदि (पति:) = गृहस्थ में प्रवेश करने पर, पति बनने पर (वध्वः वाससा) -= वधू के वस्त्रों से (स्वं अंगम्) = अपने अङ्गों को अभिधित्सते-आच्छादित करना चाहता है, अर्थात् पत्नी के वस्त्र पहनकर घर पर ही बैठा रहता है । पत्नी के साथ गपशप ही मारता रहता है तो उसका शरीर (अमुया पापया) = उस पापवृत्ति से (अश्रीरा भवति) = बिना श्री के हो जाता है, शोभाशून्य हो जाता है। [२] वधू के वस्त्रों को पहनकर घर में ही बैठे रहने का भाव प्रेमासक्त होकर अकर्मण्य बन जाने से है । विवाहित होने पर भी एक युवक हृदय-प्रधान होकर अपने कर्त्तव्यों को उपेक्षित न कर दे । पत्नी के प्रति आसक्ति उसे कर्त्तव्य विमुख न बना दे। ऐसा होने पर भोग-प्रधान होकर नष्ट - श्रीवाला हो जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- नव विवाहित युवक को चाहिये कि भोग-प्रधान जीवनवाला न बन जाये । हर समय घर में ही न बैठा रहे ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अमुया पापया) तया-अशुद्धया-रजस्वलतया (अश्रीरा) अश्लीला ‘अश्रीरम्-अश्लीलम्’ [ऋ० ६।२८।६ दयानन्दः] (रुशती तनूः-भवति) पीडिका तनूर्भवति पत्युः (यत् पतिः) यदा पतिः (वध्वः वाससा) भार्यायाः खलु वस्त्रेण (स्वम्-अङ्गम्-अभिधित्सते) स्वकीयं शरीरमभिधातुं स्प्रष्टुमिच्छति-स्पृशति ॥३०॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The body becomes polluted, injured and injurious by that impious act if the husband touches or wants to touch his body with the clothes of the wife in her period.